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सफ़र में जो भी हो रख़्ते सफ़र उठाता है / मुनव्वर राना

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सफ़र में जो भी हो रख़्ते-सफ़र[1]उठाता है
फलों का बोझ तो हर इक शजर [2] उठाता है

हमारे दिल में कोई दूसरी शबीह[3] नहीं
कहीं किराए पे कोई ये घर उठाता है

बिछड़ के तुझ से बहुत मुज़महिल[4]है दिल लेकिन
कभी कभी तो ये बीमार सर उठाता है

वो अपने काँधों पे कुन्बे का बोझ रखता है
इसीलिए तो क़दम सोचकर उठाता है

मैं नर्म मिट्टी हूँ तुम रौंद कर गुज़र जाओ
कि मेरे नाज़ तो बस क़ूज़ागर[5]उठाता है

शब्दार्थ
  1. यात्रा करने का सामान
  2. पेड़
  3. तस्वीर
  4. ग़मगीन
  5. कुम्हार