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सब से विचित्र जीवन / नाज़िम हिक़मत

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बिच्छू-से हो, बन्धु,
बिच्छू सरीखे तुम,
भयानक रात में।
नर-गौरैया, बन्धु,
नर-गौरैया हो,
छोटी-छोटी चिन्ताओं से घिरे !
सीपी के जीव से हो बन्धु,
सीपी के जीव से हो,
क़ैद में पड़े हुए, चुपचाप।
तुम अति भयावने हो, बन्धु,
सोते हुए ज्वालामुखी के मुँह-से
और तुम एक नहीं, आह, बन्धु,
पाँच नहीं, लाखों हो।
तुम भेड़ जैसे हो बन्धु,

पशुओं का सौदागर जब तुम्हारे चमड़े के कपड़े पहन लाठी उठाता है
तुम सीधे पशुओं के झुण्ड में मिल जाते
बहुत कुछ गर्व लिए, बूचड़खाने में दौड़ जाते हो।
इस तरह तुम विचित्र जीव हो
तुम उस मछली से ज़्यादा विचित्र हो।
जिसे सिन्धु में रहते हुए पता नहीं सिन्धु क्या है।
और इस पृथ्वी पर यदि इतना अत्याचार चलता है
यह भी तुम्हारी ही करनी है, मेरे बन्धु,
यदि हम अन्न को तरसते हैं, सूख कर काँटा हो जाते हैं,
यदि हड्डियों तक हमारी चमड़ी उतर जाती है
यदि हमें अँगूरों-सा कुचल दिया जाता, हमसे शराब बनती
तो मैं यह नहीं कहता सारा दोष केवल तुम्हारा है
किन्तु सबसे ज़्यादा तुम्हारा है, मेरे बन्धु !
  
अँग्रेज़ी से अनुवाद : चन्द्रबली सिंह