भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

समुन्दर: चार / शीन काफ़ निज़ाम

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

समुन्दर
तुम्हारे सीने पर
बिखरती
किरण किरण
सुबह है
या सफीहों[1] के
ओराक़े-परीशां[2]
चमचमाते चेहरे पर
शिकन-दर-शिकन
गुंजलक[3] ख़ुतूत
तज्रिब्रों की तमाज़त[4] का तिलिस्म
या तुम्हारी शिकस्तखुर्दा ख्वाहिशों की दास्ताँ के
हाँफते जाते हुरूफ़[5]
समुन्दर
शुआयें[6] तुम से मिल कर हो गई हैं
पाश-पाश[7]
या इन्हें जम कर के ख़ुद में
तुम ने ही
यूँ कर दिया है
मुंक़सिम[8]
ये तुम्हारे रंग ही के रूप हैं
या रूप के हैं रंग इतने
कौन जाने
तुम तो कुछ कहते नहीं हो
क्या समुन्दर होना कुछ कहना नहीं है

शब्दार्थ
  1. आसमानी किताबों
  2. बिखरे हुए पृष्ठ
  3. अस्पष्ट
  4. गर्मी
  5. हर्फ़ का बहुवचन
  6. किरणें
  7. टुकड़े
  8. बाँटना