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समुन्दर: दो / शीन काफ़ निज़ाम

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समुन्दर
तुम किसे आवाज़ देते
साहिलों की सम्त भागे जा रहे हो ?
क्या तुम्हारा कोई अपना है
जिसे तुम ढूँढ़ते हो
या कोई तुम से बिछड़ कर
सीपियों की कोख के रस्ते से
          साहिल पार
 
दुनिया में पड़ा
आवाज़ देता है तुम्हीं को

क्या तुम्हारा ख़्वाब कोई खो गया है
या कोई पलकों से
अनजाने छिटक कर
गिर पड़ा है
         दूर......
जिस को
फिर पीने की तमन्ना में
तुम अपने हाथ फैलाए हुए
              दिन रात
साहिल की तरफ यूँ भागते हो
क्या ?
तुम्हें भी याद अब आता नहीं है
भूलना तो याद है तुमको
मगर
क्या भूले बैठे हो
तुम्हें ये याद ही आता नहीं

सच बताओ
तुम समुन्दर हो
तुम्हें इतना तो अब तक याद है न
या
इसे भी भूल बैठे हो कहो
गर तुम्हें ये याद है कि
तुम
समुन्दर हो
ये तुम्हारी मौज है कि
तुम जिसे चाहो भुला दो
फिर कभी न याद करने

तो तुम्हें
ये भी तो हक़ है
तुम समुन्दर हो
इसे भी भूल जाओ
भूल सकने की तुम्हें तौफ़ीक़ है न
फिर
किसे आवाज़ देते
साहिलों की सम्त भागे जा रहे हो ?