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सरहद रक्षा का शोकगीत / एज़रा पाउंड / एम० एस० पटेल

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रेत की आँधी उत्तरी द्वार के पास चलती है,
तब से अब तक अकेला !
वृक्ष गिरते हैं, पतझड़ से घास पीली पड़ती है।

बर्बर देश की रक्षा करने
मैं मीनारों, मीनारों पर चढ़ता हूँ :
सुनसान किला, आकाश, विस्तृत रेगिस्तान,
इस गाँव की एक भी दीवार नहीं बची है ।

अटाटूट पाले की धवल अस्थियाँ
घास और झाड़ों से ढँके ऊँचे अम्बार,
किस ने किया इसे ?
किसने राजसी आग लगाई है ?
कौन मृदंग और भेरी के साथ सेना लाया है ?
बर्बर राजा ।

दयालु वसन्त
निष्ठुर शरद में बदल गया,
राज्य के बीच
साठ हज़ार तीन सौ सैनिकों का कोलाहल फैला,
विषाद, बारिश जैसा विषाद ।
विषाद जाने को, और विषाद, लौटता विषाद ।

सुनसान, सुनसान खेत
उन के ऊपर युद्ध के बच्चे भी नहीं हैं,
अपराध और रक्षा के लिए इनसान नहीं हैं,
अरे, उत्तरी द्वार पर निरानन्द विषाद को तुम कैसे जानोगे,
रिबोकू के नाम के साथ भुला दिया है,
शेरों के शिकार बने हम पहरेदार ।

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : एम० एस० पटेल