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सलौ / गढ़वाली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

सलौ[1] डारि[2] ऐ गैना, डालि बोटो खै गैना।
फसल पात खै गना, बाजरो खाणो कै गैना।
सलौ डारि डाँड्यूं मा बैठी गैन खाड्यूं मा।
हात झींकड़ा लीन, सलौ हांकि दीन।
काकी पकाली पलेऊ, काला हकाल मलेऊ।
भैजी हकालू टोपीन, बौ हटाली धोतीन।
उड़द गथ खै गैना, छड़ी सारी कै गैना।
भैर देखा बिजोपट, फसल देखा सफाचट।
पड़ीं च बाल बच्चों की कनी रोवा रो,
हे नौंनों का बुबा जी, सलौ ऐन सलौ।

शब्दार्थ
  1. टिड्डियों का दल
  2. टिड्डियों का दल