भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सांप इतने आस्तीं में पल गए / शेष धर तिवारी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सांप इतने आस्तीं में पल गए
हम बशर से जैसे हो संदल गए
 
प्यास ऐसी दी समंदर ने हमें
लब हमारे खुश्क होकर जल गए
 
इश्क नेमत है, क़ज़ा है या भरम ?
फैसले कितने इसी पर टल गए
 
बेअसर होती गयी हर बद्दुआ
हम दुआ देने कि बाज़ी चल गए

हो गए बर्बाद हम तो क्या हुआ
नाअहल भाई भतीजे पल गए