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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / चतुर्थ सर्ग / पृष्ठ ४

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धैर्य सहित सब कुछ सहना,
दोनों सिंह-सदृश रहना।
लक्ष्मण! तू बड़भागी है,
जो अग्रज-अनुरागी है।
मन ये हों, तन तू वन में,
धन ये हों, जन तू वन में।"

लक्ष्मण का तन पुलक उठा,
मन मानों कुछ कुलक उठा।
माँ का भी आदेश मिला,
पर वह किसका हृदय हिला?
कहा उर्मिला ने--"हे मन!
तू प्रिय-पथ का विघ्न न बन।
आज स्वार्थ है त्याग-भरा!
हो अनुराग विराग-भरा!
तू विकार से पूर्ण न हो,
शोक-भार से चूर्ण न हो।
भ्रातृ-स्नेह-सुधा बरसे,
भू पर स्वर्ग-भाव सरसे!"
प्रस्तुत हैं प्राणस्नेही,
चुप थी अब भी वैदेही।
कहतीं क्या वे प्रिय जाया,
जहाँ प्रकाश वहीं छाया।

इसी समय दुख से छाये,
सचिव सुमन्त्र वहाँ आये।
वे परिवार-भुक्त-से थे,
अति अविभिन्न युक्त-से थे।
प्रभु जो उनकी ओर बढ़े,
प्रथम अश्रु फिर वचन कढ़े--
"राम! क्या कहूँ मैं अब हा!
बन कर भी बिगड़ा सब हा!
देख तुम्हारा निष्कासन,
कैकेयी-सुत का शासन,
नहीं चाहती कभी प्रजा।
उड़ी क्रान्ति की कहीं ध्वजा?
विदित तुम्हें है नृप-गति भी
कैकेयी की दुर्मति भी।
ऐसी विषमावस्था है,
फिर भी वन-व्यवस्था है!
पितृ-स्पृहा क्या ज्ञेय नहीं?
प्रजा-भाव क्या ध्येय नहीं?
प्रभु बोले--"यह बात नहीं,
तात! तुम्हें क्या ज्ञात नहीं?
स्पृहा बड़ी या धर्म बड़ा?
किस में है शुभ कर्म बड़ा?
और प्रजा में द्रोह कहाँ?
है बस मेरा मोह वहाँ?
मैंने क्या कर दिया किसे,
कर न सकेंगे भरत जिसे?
उनके निन्दावाक्य मुझे--
होंगे विष के बाण बुझे।
उनकी निन्दा मेरी है,
प्रजा प्रीति की प्रेरी है।
पर वे मेरे भ्राता हैं,
मँझली माँ भी माता हैं।"
अब सुमन्त्र कुछ कह न सके,
पर नीरव भी रह न सके!
खड़े रहे वे मुँह खोले,
फिर धीरे धीरे बोले--
"नहीं जानता मैं रोऊँ,
या आनन्द-मग्न होऊँ!
राम! तुम्हारा मंगल हो,
प्राप्त हमें आत्मिक बल हो।
तुम भूतल से भिन्न नहीं,
हम सबसे विच्छिन्न नहीं।
उर से किन्तु अलौकिक हो,
निज पतंग-कुल के पिक हो!
अन्तःकरण अपार्थिव है,
उदित वहाँ दिव ही दिव है!
अमरवृन्द नीचे आवें,
मानव-चरित देख जावें।
वन में ही यदि रहना है
तो नृप का यह कहना है--
’तुम सुमन्त्र रथ ले जाओ,
पुत्रों को पहुँचा आओ।
भरत यहाँ आवें जब लों,
बचा रहा यदि मैं तब लों,
तो मैं उन्हें राज्य दूँगा,
वन में स्वयं प्राप्त हूँगा।"

सबने ऊर्ध्वश्वास लिया,
या उर को आश्वास दिया!
प्रभु बोले--"तो देर न हो,
रथ जुतने के लिए कहो।
अब वल्कल पहनूँ बस मैं,
बनूँ वनोचित तापस मैं।
यहीं रजोगुण-लेश रहे,
वन में सात्विक वेश रहे।"

रोते हुए सुमन्त्र गये,
आये वल्कल वस्त्र नये।
बढ़े प्रथम कर कोमल दो,
या मृणालयुत शतदल दो!
सीता चुप, सब रोती थीं,
दृग-जल से मुँह धोती थीं।
"बहू! बहू!" माँ चिल्लाईं,
आँखें दूनी भर आईं--