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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / दशम सर्ग / पृष्ठ ४

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वह श्यामल-गौर गात्र थे,
उनके-से कह, कौन पात्र थे?
वह पुण्यकृती अपाप थे,
पहले ही अवतीर्ण आप थे।
दुगुने वह धीर-वीर थे,
सुकृती ये कल-नीर-तीर थे।
प्रभु दायक जो उदार थे,
जननी तीन, सुपुत्र चार थे।
कुल-पादप-पुण्य-मूलता,
फल चारों फल क्यों न फूलता?

वह बाल्य कथा विनोदिनी,
कहना तू कल-मूर्त्ति मोदिनी।
सुनना भर शक्य था मुझे,
जिसके दर्शन हो चुके तुझे।
समझी अब मैं प्रवाहिणी,
यह तू क्यों बहु ग्राह-ग्राहिणी।
निज वीर-विनोद-पक्ष के,
वह हैं साधन लोल-लक्ष के।
तुमको शर थे न सालते?
शर, जो पत्थर फाड़ डालते।
सहिए शत साल शूल-से,
फलते हैं तब लाल-फूल से।
कितने खुल खेल हैं हुए,
कितने विग्रह-मेल हैं हुए,
कितनी ध्वनि-धूम है मची--
इन फूलों पर, कल्पना बची!
सरयू, कह दूँ तवस्मृति?--
उछला कन्दुक मोदकाकृति,
वह अंचल में लिया लिया--
जब तूने, शर ने उड़ा दिया!

जननी इस सौध-धाम में
उनके ही शुभ-सौख्य-काम में,
करतीं कितने प्रयोग थीं,
रचतीं व्यंजन-बाल-भोग थीं।
तनुजों पर प्राण वारतीं,
तनु की भी सुध थीं विसारतीं।
करतीं व्रत वे नये नये,
कृश होतीं, पर मग्न थीं अये!
वह अंचल धूल पोंछते,
कर कंघी धर बाल ओंछते।
हँस बालक दूर भागते,
कुल के दीप अखण्ड जागते।

तटिनी, उन तात की कथा,
तनयों-सा प्रिय प्राण भी न था।
बस एक नभोमयंक था,
रखता चार उदार अंक था।
गुह और गणेश ईश के,
बस प्रद्युम्न प्रसिद्ध श्रीश के,
पर कोसलराज के चुने,
दुगुने थे यह और चौगुने!
वर मौक्तिक-माल्य तोड़ते,
उसको वे फिर छींट छोड़ते।
कहते--’हम चौक पूरते।’
’लड़की हो?’--हँस तात घूरते।
करती जब नाट्य ठाठ का,
धर मैं भी करवाल काठ का;
तब माँ अति मोद मानतीं,
मुझको वे ’लड़का’ बखानतीं!
उनके प्रिय पुत्र थे यहाँ,
इनकी थीं हम पुत्रियाँ वहाँ।
मिलनावधि ही प्रतीक्ष्य थी,
अब-सी हन्त न किन्तु वीक्ष्य थी!

वह जो शुभ भाग्य था छिपा,
प्रकटा कौशिक-रूप में, दिपा।
दिव में वह दस्यु हों सुखी,
मुनि आये जिनसे दुखी दुखी!
जिस आत्मज युग्म के बिना
अपना जीवन त्याज्य ही गिना;
वह भी मुनि को दिया, दिया,
कितना दुष्कर तात ने किया!
जननी कुल-धर्म पालतीं,
तब भी थीं सब अश्रु डालतीं।
सरयू, रह भाव-गद्गदा,
रघुवंशी बलि धर्म के सदा।
कसतीं कटि थीं कनिष्ठ माँ,
असि देतीं मँझली घनिष्ठ माँ।
कह-’क्यों न हमें किया प्रजा?’
पहनातीं वह ज्येष्ठ माँ स्रजा।
प्रभु ने चलते हुए कहा--
’अब शान्ते, भय-सोच क्या रहा,
भगिनी, जय-मूर्त्ति-सी झुकी,
यह राखी जब बाँध तू चुकी?’

कृति में दृढ़, कोमलाकृति,
मुनि के संग गये महाघृति।
भय की परिकल्पना बड़ी,
पथ में आकर ताड़का अड़ी।
प्रभु ने, वह लोक-भक्षिणी,
अबला ही समझी अलक्षिणी।
पर थी वह आततायिनी,
हत होती फिर क्यों न डाइनी।