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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / दशम सर्ग / पृष्ठ ७

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मुझको प्रिय स्वप्न में मिले;
पर बोले वह--’हाय उर्मिले!
वर हूँ, पर वीर हूँ, वरो,
धर लो धीरज तो मुझे धरो।’
मुखरा मति मौन ही रही,
पर थी सम्मति-सी हुई वही।
’अबला तुम!’--हाय रे छली!
वरती हूँ तब तो महाबली।
’वह मानस क्या गभीर है?
रखता मज्जन-योग्य नीर है?’
लघु है यह, आप थाह लो;
पर जो हो, अब तो निबाह लो!
’तब क्या उपहार दूँ, कहो?
धन क्या, मैं मन वार दूँ अहो!
कर में शर है कि शूल है।’
निरखूँ तो वह एक फूल है!
प्रिय ने कर जो बढ़ा दिया,
धर मैंने सिर से चढ़ा लिया।
पलकें ढ़ल हाय! जो खुलीं,
हँसती थी किरणें मिली जुली!
सहसा यह क्या हुआ अरे!
उघरे क्यों फिर नेत्र ये मरे?
बस था वह स्वप्न ही सही,
सब मिथ्या, ध्रुव सत्य था वही!

जिसने मम यातना सही,
यह पार्श्वस्थ सुलक्षणा वही।
यह भी उस काल थी खली,
मुझको जो घर संग ले चली।
सब ओर विशेष धूम थी,
इस जी में बस एक घूम थी।
जिसके वह आसपास थी,
करती हा! वह मूर्त्ति हास थी!

निज सौध-समक्ष ही भली,
स्थित थी दीर्घ स्वयंवरस्थली;-
जिसमें वर ही बधू वरे,
यदि निर्धारित धीरता धरे।
दृग-दीपक थे बुझे बुझे,
पहला सोच हुआ यही मुझे--
प्रभु चाप न जो चढ़ा सके?
उड़ता था मन, अंग थे थके।
तब मैं अति आर्त हो उठी,
धर जीजी-धन को भिगो उठी।
हँस वे कहने लगीं--’अरी,
यह तू क्यों इतना डरी डरी?
चढ़ता उनसे न चाप जो,
वह होते न समर्थ आप जो,
उठती यह भोंह भी भला
उनके ऊपर तो अचंचला?
दृढ़ प्रत्यय के बिना कहीं
यह आत्मार्पण दीखता नहीं।
मधु को निज पत्र क्यों, बता,
करती अर्पित पूर्व ही लता?
बनती जब आप अर्पिता,
वह वर्त्ती वह स्नेह-तर्पिता,-
उसको भर अंक भेटता,
तब पीछे तम दीप मेटता।
निज निश्वय-हानि क्यों हुई?
तुझको भी यह ग्लानि क्यों हुई?
पगली, कह, बात क्या हुई?
घृति भी अर्पित रात क्या हुई?’
उस प्रत्यय प्रेम में पगीं,
मुझको वे फिर भेटने लगीं।
तब विस्मित-मूढ़-सी निरी,
चरणों में चुपचाप मैं गिरी।
अनुजा यह मैं उपासिका,
उनकी क्या कम किन्तु दासिका?
लघु चित्त हुआ, न ताप था,
गुरु तो भी वह शम्भु चाप था।

तब प्रस्तुत रंगभूमि में,
नृप-भावाम्बु-तरंग-भूमि में,
निज मानस-हंस-सद्मिनी;
पहुँचीं वे प्रभु-प्रेम-पद्मिनी।
वरमाल्य-पराग छोड़ के,
उनके ऊपर सैन्य जोड़ के,
नृप-नेत्र-मिलिन्द जो जुड़े,
सजनी-चामर से परे उड़े।
बल-यौवन-रूप-वेश का,
अपने शिष्ट-विशिष्ट देश का,
दिखला कर लोभ लुब्ध था,
फिर भी राज-समाज क्षुब्ध था।
नृप-सम्मुख नम्र नाक था,
पर मध्यस्थ महापिनाक था।
सिर मार मरे नहीं हटा,
न रही नाक, पिनाक था डटा।
सब का बल व्यर्थ ही बहा,
तब दुःखी-सम तात ने कहा--
’बस वाहुजता विलीन है,
वसुधा वीर-विहीन दीन है!’
’कहता यह बात कौन है?
सुनता सत्कुलजात कौन है?
गरजे प्रिय जो ’नहीं नहीं’
सरयू, ये हत नेत्र थे वहीं।
शिखरस्थित सिंह-गर्जना--
वह मंचोपरि कान्त-तर्जना।