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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / द्वादश सर्ग / पृष्ठ १०

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“किन्तु देख यह वेश दुखी होंगे वे कितने?”
“तो, ला भूषण-वसन, इष्ट हों तुझको जितने।
पर यौवन-उन्माद कहाँ से लाऊँगी मैं?
वह खोया धन आज कहाँ सखि, पाऊँगी मैं?”
“अपराधी-सा आज वही तो आने को है,
बरसों का यह दैन्य सदा को जाने को है।”
“कल रोती थीं आज मान करने बैठी हो,
कौन राग यह, जिसे गान करने बैठी हो?
रवि को पाकर पुनः पद्मिनी खिल जाती है,
पर वह हिमकण बिना कहाँ शोभा पाती है?”
“तो क्या आँसू नहीं सखी, अब इन आँखों में?
फूटें, पानी न हो बड़ी भी जिन आँखों में!”
“प्रीति-स्वाति का पिया शुक्ति बन बन कर पानी,
राजहंसिनी, चुनो रीति-मुक्ता अब रानी!”
“विरह रुदन में गया, मिलन में भी मैं रोऊँ;
मुझे और कुछ नहीं चाहिए पद-रज धोऊँ।
जब थी तब थी आलि, उर्मिला उनकी रानी,
वह बरसों की बात, आज होगई पुरानी!
अब तो केवल रहूँ सदा स्वामी की दासी,
मैं शासन की नहीं, आज सेवा की प्यासी।
युवती हो या आलि, उर्मिला बाला तन से,
नहीं जानती किन्तु स्वयं, क्या है वह मन से!
देखूँ, कह, प्रत्यक्ष आज अपने सपने को,
या सजबज कर आप दिखाऊँ मैं अपने को?
सखि, यथेष्ट है यही धुली धोती ही मुझको;
लज्जा उनके हाथ, व्यर्थ चिन्ता है तुझको।
उछल रहा यह हृदय अंक में भर ले आली,
निरख तनिक तू आज ढीठ सन्ध्या की लाली!
मान करूँगी आज? मान के दिन तो बीते,
फिर भी पूरे हुए सभी मेरे मनचीते।
टपक रही वह कुंज-शिला वाली शेफाली,
जा नीचे, दो चार फूल चुन, ले आ डाली!
वनवासी के लिए सुमन की भेंट भली वह!”
“किन्तु उसे तो कभी पा चुका प्रिये, अली यह!”
देखा प्रिय को चौंक प्रिया ने, सखी किधर थी?
पैरों पड़ती हुई उर्मिला हाथों पर थी!

लेकर मानों विश्व-विरह उस अन्तः पुर में,
समा रहे थे एक दूसरे के वे उर में।
रोक रही थी उधर मुखर मैंना को चेरी--
‘यह हत हरिणी छोड़ गये क्यों नये अहेरी।’
“नाथ, नाथ, क्या तुम्हें सत्य ही मैंने पाया?”
“प्रिये, प्रिये, हाँ आज-आज ही-वह दिन आया।
मेघनाद की शक्ति सहन करके यह छाती,
अब भी क्या इन पाद-पल्लवों से न जुड़ाती?
मिला उसी दिन किन्तु तुम्हें मैं खोया खोया,
जिस दिन आर्या बिना आर्य का मन था रोया।
पूर्ण रूप से सुनो, तुम्हें मैंने कब पाया,
जब आर्या का हनूमान ने हाल सुनाया!
अब तक मानों जिसे वेशभूषा में टाला,
अपने को ही आज मुझे तुमने दे डाला।
आँखों में ही रही अभी तक तुम थी मानों,
अन्तस्तल में आज अचल निज आसन जानों।
परिधि-विहीन सुधांशु-सदृश सन्ताप-विमोचन,
घूलि रहित, हिम-धौत सुमन-सा लोचन-रोचन,
अपनी द्युति से आप उदित, आडम्बर त्यागे,
धन्य अनावृत-प्रकृत-रूप यह मेरे आगे।
जो लक्ष्मण था एक तुम्हारा लोलुप कामी,
कह सकती हो आज उसे तुम अपना स्वामी।”
“स्वामी, स्वामी, जन्म जन्म के स्वामी मेरे!
किन्तु कहाँ वे अहोरात्र, वे साँझ-सबेरे!
खोई अपनी हाय! कहाँ वह खिल खिल खेला?”
“प्रिय, जीवन की कहाँ आज वह चढ़ती वेला?”
काँप रही थी देह-लता उसकी रह रह कर,
टपक रहे थे अश्रु कपोलों पर बह बह कर।
“वह वर्षा की बाढ़, गई, उसको जाने दो,
शुचि-गभीरता प्रिये, शरद की यह आने दो।
धरा-धाम को राम-राज्य की जय गाने दो,
लाता है जो समय प्रेम-पूर्वक, लाने दो।

तुम सुनों, सदैव समीप है-
जो अपना आराध्य है;
आओ, हम साधें शक्ति भर,
जो जीवन का साध्य है।

अलक्ष की बात अलक्ष जानें,
समक्ष को ही हम क्यों न मानें?
रहे वहीं प्लावित प्रीति-धारा,
आदर्श ही ईश्वर है हमारा।”

स्वच्छतर अम्बर में छनकर आ रहा था
स्वादु-मधु-गन्ध से सुवासित समीर-सोम,
त्यागी प्रेम-याग के व्रती वे कृती जायापती
पान करते थे गल-बाँह दिये, आपा होम।
क्षुद्र कास-कुश से लगा कर समुद्र तक,
मेदनी में किसका था मुदित न रोम रोम?
समुदित चन्द्र किरणों का चौंर ढारता था,
आरती उतारता था दिव्य दीप वाला व्योम!

श्रीरामचरणार्पणमस्तु।
दीपावली
संवत् १९८६ विक्रमी
चिरगाँव।