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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / द्वादश सर्ग / पृष्ठ ७

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चौड़े चौड़े चार वक्ष-से लंका गढ़ के,
तोड़े द्वार-कपाट कटक ने बढ़ के, चढ़ के।
प्रथम वेग से बचे शत्रु, जो सजग खड़े थे,
कर के अब हुंकार प्रेत-से टूट पड़े थे।
दल-बादल भिड़ गये, धरा धँस चली धमक से,
भड़क उठा क्षय कड़क तड़क से, चमक दमक से!
रण-भेरी की गमक, सुभट नट-से फिरते थे,
ताल ताल पर रुण्ड-मुण्ड उठते-गिरते थे!
छिन्न-भिन्न थे वक्ष, कण्ठ, मस्तक, कर, कन्धे,
हुए क्रोध से उभय पक्ष थे मानों अन्धे।
मिला रक्त से रक्त, वैर-सम्बन्ध फला यों,
वीर-वरों के पैर वहाँ धुलते न भला क्यों!
अग्र पंक्ति का पतन जिधर होता जैसे ही,
बढ़ पीछे की पंक्ति पूर्त्ति करती वैसे ही।
दो धाराएँ उमड़ उमड़ सम्मुख टकरातीं,
उठतीं होकर एक और गिरतीं, चकरातीं।
मची खलबली गली गली में लंकापुर की,
आँखों में आ झाँक उठी आतुरता उर की।
आया रावण जिधर दिव्य-रथ में राघव थे,
क्या ही गौरव भरे आज प्रभु-कर-लाघव थे!
गरजा राक्षस-“ठहर, ठहर तापस, मैं आया,
जी कर तेरा शोक-मात्र लक्ष्मण ने पाया!
पंचानन के गुहा-द्वार पर रक्षा किसकी?
मैं तो हूँ विख्यात दशानन, सुध कर इसकी!”
हँस बोले प्रभु--“तभी द्विगुण पशुता है तुझमें,
तू ने ही आखेट-रंग उपजाया मुझमें!”
दशमुख को संग्राम, राम को थी वह क्रीड़ा,
स्थितप्रज्ञ को दशों इन्द्रियों की क्या पीड़ा?
“धन्य पुण्यजन, धन्य शूरता तुझ-से जन की,
वीर, दूर कर कुटिल क्रूरता अब भी मन की।
बल, विकास के लिए, नाश के लिए नहीं है,
किन्तु रहे वह शक्ति न,-जिससे ह्रास कहीं है।”
“भय लगता है मनुज, तुझे तो क्यों आया था?”
“अरे निशाचर, मुझे काल तेरा लाया था।
चिर परिचित तू जान त्राण-करुणा से मुझको,
भय से परिचित करा सके तो जानूँ तुझको!”
रिपु के सौ सौ शस्त्र वेगपूर्वक आते थे,
कट जाते थे किन्तु, उन्हें कब छू पाते थे।
घिरा घोर घन, तड़ित्तेज चौंका देता था,
किन्तु पवन झट उसे एक झोंका देता था!
पूर्व अयन पर कौन रोकता रामानुज को?
हुए सुभुज वे सिद्ध-योग-से राक्षस-रुज को।
निकुम्भला में मेघनाद साधन करता था,
विजय-हेतु निज इष्ट-समाराधन करता था।
नल-वन-सम दल शत्रु जनों को, वे भुज-बल से;
पुर में हुए प्रविष्ट, जलधि में बड़वानल-से।
अंगदादि भट संग गये अपने को चुनके,
उड़ते-से अंगार हुए वे उत्कट उनके।
हलचल-सी मच गई, कोट भर में कलकल था,
अरि-दल पीछे जा न सका, आगे प्रभु-दल था।
रावण ने चाहा कि लौट लक्ष्मण को घेरे,
गरजे प्रभु--“धिक भीरु! पीठ जो मुझसे फेरे।
इसे समझ रख, आज भाग भी तू न सकेगा।”
गरजा रावण--“अटक कहाँ तक तू अटकेगा।
भय क्या, पक्षी आज स्वयं पिंजरे में पैठा,
तू भी उसकी दशा देखियो, पथ में बैठा।”
उधर हाँक सुन हनुमान की पुरजन दहले--
“मैं वह हूँ जो जला गया था लंका पहले!
मेघनाद ही हमें चाहिए आज, कहाँ वह?”
पहुँचे सब निज यज्ञ-लग्न था मग्न जहाँ वह।
भीषण थी भट-मूर्त्ति अहा! क्या भली बनी थी;
रक्त-मांस की नहीं, धातु की ढली बनी थी!
वेदी भट्ठी बनी,--छोड़ती थी जो ज्वाला,
पहनाती थी उसे आप वह मोहन-माला!
पशु-बलि देकर बली शस्त्र-पूजन करता था,
अस्फुट मन्त्रोच्चार कलित-कूजन करता था।
ठिठक गये सब एक साथ पल भर निश्चल-से,
बोले तब सौमित्रि भड़ककर दावानल-से--
“अरे इन्द्रजित, देख, द्वार पर शत्रु खड़ा है,
करता उससे विमुख कौन तू कर्म बड़ा है?
जिसके सिर पर शत्रु, धर्म उसका--वह जूझे,
किन्तु पतित तू आर्य-मर्म क्या समझे-बूझे।”
चौंक हतप्रभ हुआ शत्रु--“कैसे तू आया?
घर का भेदी कौन--यहाँ जो तुझको लाया?”
“अरे, काल के लिए कौन पथ खुला नहीं है?
आता अपने आप अन्त तो सभी कहीं है।
मैं हूँ तेरा अतिथि युद्ध का भूखा, ला तू,
कर ले कुछ तो धर्म,-‘अतिथि देवो भव’-आ तू!”
“लक्ष्मण, तुझ-सा अतिथि देख मैं कब डरता हूँ!
पर कह, क्या यह धर्म नहीं जो मैं करता हूँ?”
“कौन धर्म यह--शत्रु खड़े हुंकार रहे हैं--
तेरे आयुध यहाँ दीन पशु मार रहे हैं।”
“करता हूँ मैं वैरि-विजय का ही यह साधन।”
“तब है तेरा कपट मात्र यह देवाराधन।
ठहर, ठहर, बस, वृथा वंचना न कर अनल की,
कर केवल कर्त्तव्य, छोड़ दे चिन्ता फल की।”
“लक्ष्मण, मेरी शक्ति अभी क्या भूल गया तू?
मरते मरते बचा, इसीसे फूल गया तू?”
“देखी तेरी शक्ति, उसी पर तू इतराया?--
जिसको मेरी एक जड़ी ने ही छितराया।
है क्या कोई युक्ति यहाँ भी, बतला मुझको,
जो तेरा सिर जोड़ जिला दे फिर भी तुझको?
यह तो हुआ विनोद, किन्तु सचमुच मैं भाई,
देने आया तुझे उसी के लिए बधाई।
बैठा है क्यों छिपा, अनोखे आयुधधारी?
उठ, प्रस्तुत हो, देख तनिक अब मेरी बारी।
पूर्ण करूँगा यज्ञ आज तेरी बलि देकर”--
खड़ा हो गया शूर सर्प-सा आयुध लेकर।
हुआ वहाँ सम-समर अनोखा साज सजा कर,
देते थे पद-ताल उभय कर-लोह बजा कर!