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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / द्वादश सर्ग / पृष्ठ ९

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वर विमान से कूद, गरुड़ से ज्यों पुरुषोत्तम,
मिले भरत से राम क्षितिज में सिन्धु-गगन-सम!
“उठ, भाई, तुल न सका तुझसे, राम खड़ा है,
तेरा पलड़ा बड़ा, भूमि पर आज पड़ा है!
गये चतुर्दश वर्ष, थका मैं नहीं भ्रमण में,
विचरा गिरि-वन-सिन्धु-पार लंका के रण में।
श्रान्त आज एकान्त-रूप-सा पाकर तुझको,
उठ, भाई, उठ, भेंट, अंक में भर ले मुझको!
मैं वन जाकर हँसा, किन्तु घर आकर रोया,
खोकर रोये सभी, भरत, मैं पाकर रोया।”
“आर्य, यही अभिषेक तुम्हारे भृत्य भरत का,
अन्तर्बाह्य अशेष आज कृत्कृत्य भरत का।”
पूरी भी थीं युगल मूर्त्तियाँ अब तक ऊनी,
मिल होकर भी एक, हर्ष से थीं अब दूनी।
हिल हिल कर मिल गईं परस्पर लिपट जटाएँ,
मुख-चन्द्रों पर झूम रही थीं घूम घटाएँ।

साधु भरत के अश्रु गिरें चरणों में जब लों,
नयनों में ही भरे सती सीता ने तब लों।
लता-मूल का सिंचा सलिल फूलों में फूटा,
फैला वह रस-गन्ध सर्वदा सब ने लूटा।
देवर-भाभी मिले, मिले सब भाई भाई,
बरसे भू पर फूल, जयध्वनि ऊपर छाई।
भरत मिले सुग्रीव-विभीषण से यह कह कर,
‘सफल बन्धु-सम्बन्ध हमारा तुममें रह कर।’

पैदल ही प्रभु चले भीड़ के संग पुरी में,
संघर्षित थे आज अंग से अंग पुरी में।
अहा! समाई नहीं अयोध्या फूली फूली,
तब तो उसमें भीड़ अमाई ऊली ऊली!
पुरकन्याएँ खील-फूल-धन बरसाती थीं,
कुल-ललनाएँ धरे भरे शुभ घट, गाती थीं,--
“आज हमारे राम हमारे घर फिर आये,
चारों फल हैं इसी लोक में हमने पाये।”
द्वार द्वार पर झूल रही थीं शुभ मालाएँ,
झलती थीं ध्वज-व्यजन शील-शीला शालाएँ।
राजमार्ग में पड़े पाँवड़े फूल भरे थे,
छत्र लिए थे भरत, चौंर शत्रुघ्न धरे थे।
माताओं के भाग आज सोते से जागे,
पहुँचे पहुँचे राम राज-तोरण के आगे।
न कुछ कह सकीं, न वे देख ही सकीं सुतों को,
रोकर लिपटीं उठा उठा उन प्रणति युतों को।
काँप रही थीं हर्ष-भार से तीनों थर थर,
लुटा रही थीं रत्न आज वे तीनों भर भर।
लिये आरती वे उतारती थीं तीनों पर,
क्या था, जिसे न आज वारती थीं तीनों पर।
दिन था मानों यही बधू-वर के लेने का,
जो जिसको हो इष्ट, वही उसको देने का।
“बहू, बहू, वैदेहि, बड़े दुख पाये तू ने।”
“माँ, मेरे सुख आज हुए हैं दूने दूने!”
“आया फिर तू राम, कोख में मानों मेरी,
लक्ष्मण, मेरी गोद रहे शिशु-शैय्या तेरी।”
“जन्म जन्म में यही कोख जननी, मैं पाऊँ,”
“माँ, मैं लक्ष्मण इसी गोद में पलता आऊँ।”
सुप्रभ प्रभु ने कहा सुमित्रा से नत होकर--
“पाया मैं ने अम्ब, पुनः लक्ष्मण को खोकर।
रख न सका मैं हाय! दिया मुझको जो तुमने,
धन्य तुम्हारा पुण्य, प्राण पाये इस द्रुम ने।”
“किन्तु तुम्हें ही सौंप चुकी हूँ राम इसे मैं,
लूँ फिर कैसे उसे, दे चुकी आप जिसे मैं?
लिया अन्य का भार भरत ने, मैं अब हलकी,
तुमको पाया, रही कामना फिर किस फल की?”

समझी प्रभु ने कसक भरत-जननी के मन की,
“मूल शक्ति माँ, तुम्हीं सुयश के इस उपवन की।
फल, सिर पर ले धूल, दिये तुमने जो मीठे
उनके आगे हुए सुधा के घट भी सीठे।”
“भागी हो तुम वत्स राम रघुवर, भव भर के,
कैकेयी के दोष लिये तुमने गुण करके।
ढोया जीवन-भार, दुःख ही ढाया मैं ने,
पाकर तुम्हें परन्तु भरत को पाया मैं ने!”

मिल बहनों से हुई चौगुनी सचमुच सीता,
गाई प्रभु ने बधू उर्मिला की गुण-गीता--
“तू ने तो सहधर्मचारिणी के भी ऊपर
धर्मस्थापन किया भाग्यशालिनि, इस भू पर!”

मानों मज्जित हुई पुरी जय जय के रव में,
पुरजन, परिजन लगे इधर अभिषेकोत्सव में।
पाई प्रभु से इधर नई छवि राज-भवन ने,
सागर का माधुर्य पी लिया मानों घन ने!

पाकर अहा! उमंग उर्मिला-अंग भरे थे,
आली ने हँस कहा--“कहाँ ये रंग भरे थे?
सुप्रभात है आज, स्वप्न की सच्ची माया!
किन्तु कहाँ वे गीत, यहाँ जब श्रोता आया!
फड़क रहा है वाम नेत्र, उच्छ्वसित हृदय है;
अब भी क्या तन्वंगि, तुम्हें संशय या भय है?
आओ, आओ, तनिक तुम्हें सिंगार सजाऊँ,
बरसों की मैं कसक मिटाऊँ, बलि बलि जाऊँ।”
“हाय! सखी, शृंगार? मुझे अब भी सोहेंगे?
क्या वस्त्रालंकार मात्र से वे मोहेंगे?
मैं ने जो वह ‘दग्ध-वर्त्तिका’ चित्र लिखा है,
तू क्या उसमें आज उठाने चली शिखा है?
नहीं, नहीं, प्राणेश मुझी से छले न जावें,
जैसी हूँ मैं, नाथ मुझे वैसा ही पावें।
शूर्पणखा मैं नहीं--हाय, तू तो रोती है!
अरी, हृदय की प्रीति हृदय पर ही होती है।”