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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / द्वितीय सर्ग / पृष्ठ २

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’भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह!’
पवन भी मानों उसी प्रकार
शून्य में करने लगा पुकार--
’भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह!’
गूँजते थे रानी के कान,
तीर-सी लगती थी वह तान--
’भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह!’
मूर्ति-सी बनी हुई उस ठौर
खड़ी रह सकी न अब वह और।
गई शयनालय में तत्काल;
गभीरा सरिता-सी थी चाल।
न सह कर मानों तनु का भार,
लेट कर करने लगी विचार।
कहा तब उसने--"हे भगवान,
आज क्या सुनते हैं ये कान?
मनोमन्दिर की मेरी शान्ति
बनी जाती है क्यों उत्क्रान्ति?
लगा दी किसने आकर आग?
कहाँ था तू संशय के नाग?
नाथ, कैकेयी के वर-वित्त,
चीर कर देखो उसका चित्त।
स्वार्थ का वहाँ नहीं है लेश,
बसे हो एक तुम्हीं प्राणेश!
सदा थे तुम भी परमोदार,
हुआ क्यों सहसा आज विकार?
भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उसे जो गेह!
न थी हम माँ-बेटे की चाह,
आह! तो खुली न थी क्या राह?
मुझे भी भाई के घर नाथ,
भेज क्यों दिया न सुत के साथ?
राज्य का अधिकारी है ज्येष्ठ,
राम में गुण भी हैं सब श्रेष्ठ।
भला फिर भी क्या मेरा वत्स
शान्त रस में बनता वीभत्स?
तुम्हारा अनुज भरत हे राम,
नहीं है क्या नितान्त निष्काम?
जानते जितना तुम कुलधन्य,
भरत को कौन जानता अन्य?
भरत रे भरत, शील-समुदाय,
गर्भ में आकर मेरे हाय!
हुआ यदि तू भी संशय-पात्र,
दग्ध हो तो मेरा यह गात्र!
चली जा पृथिवी, तू पाताल,
आप को संशय में मत डाल।
कहीं तुझ पर होता विश्वास,
भरत में पहले करता वास।
अरे विश्वास, विश्व-विख्यात,
किया है किसने तेरा घात?
भरत ने? वह है तेरी मूर्ति,
राम ने? वह है प्राणस्फूर्ति।
देव ने? वे हैं सदय सदैव,
दैव ने? हा घातक दुर्दैव!
तुझे क्या हे अदृष्ट, है इष्ट?
सूर्य-कुल का हो आज अनिष्ट?
बाँध सकता है कहाँ परन्तु--
राघवों को अदृष्ट का तन्तु?
भाग्य-वश रहते हैं बस दीन,
वीर रखते हैं उसे अधीन।
हाय! तब तूने अरे अदृष्ट,
किया क्या जीजी को आकृष्ट?
जान कर अबला, अपना जाल--
दिया है उस सरला पर डाल?
किन्तु हा! यह कैसा सारल्य?
सालता है जो बनकर शल्य।
भरत-से सुत पर भी सन्देह,
बुलाया तक न उसे जो गेह!
बहन कौसल्ये, कह दो सत्य,
भरत था मेरा कभी अपत्य?
पुत्र था कभी तुम्हारा राम?
हाय रे! फिर भी यह परिणाम?
किन्तु चाहे जो कुछ हो जाय,
सहूँगी कभी न यह अन्याय।
करूँगी मैं इसका प्रतिकार,
पलट जावे चाहे संसार।
नहीं है कैकेयी निर्बोध,
पुत्र का भूले जो प्रतिशोध।
कहें सब मुझको लोभासक्त,
किन्तु सुत, हूजो तू न विरक्त।

भरत की माँ हो गई अधीर,
क्षोभ से जलने लगा शरीर।
दाह से भरा सौतिया डाह,
बहाता है बस विषप्रवाह।
मानिनी कैकेयी का कोप
बुद्धि का करने लगा विलोप।
और रह सकी न अब वह शान्त,
उठी आँधी-सी होकर भ्रान्त।
एड़ियों तक आ छूटे केश,
हुआ देवी का दुर्गा-वेश।
पड़ा तब जिस पदार्थ पर हस्त
उसे कर डाला अस्त-व्यस्त।
तोड़ कर फेंके सब श्रृंगार,
अश्रुमय-से थे मुक्ता-हार।
मत्त कारिणी-सी दल कर फूल
घूमने लगी आपको भूल।