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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / नवम सर्ग / पृष्ठ १४

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तुम सुखी रहो हे विरागिनी,
बस विदा मुझे पुण्यभागिनी!
हट सुलक्षणे, रोक तू न यों,
पतित मैं, मुझे टोक तू न यों।
विवश लक-’ ’नहीं, उर्मिला हहा!’
किधर उर्मिला? आलि, क्या कहा?

फिर हुई अहा! मत्त उर्मिला,
सखि, प्रियत्व था क्या मुझे मिला?
यह वियोग या रोग, जो कहे,
प्रियमयी सदा उर्मिला रहे।

उन्मादिनी कभी थी,
विवेकिनी उर्मिला हुई सखि, अब है;
अज्ञान भला, जिसमें
सोंह तो क्या, स्वयं अहं भी कब है?
बँध कर घुलना अथवा,
जल पल भर दीप-दान कर खुलना;
तुझको सभी सहज है,
मुझको कर्पूरवर्त्ति, बस घुलना!

लाना, लाना, सखि, तूली!
आँखों में छवि झूली।
आ, अंकित कर उसे दिखाऊँ;
इस चिन्ता से छुट्टी पाऊँ;
डरती हूँ, फिर भूल न जाऊँ;
मैं हूँ भूली भूली,
लाना, लाना, सखि, तूली!
जब जल चुकी विरहिणी बाला,
बुझने लगी चिता की ज्वाला,
तब पहुँचा विरही मतवाला,
सती-हीन ज्यों शूली।
लाना, लाना, सखि, तूली!
झुलसा तरु मरमर करता था;
झड़ निर्झर झरझर झरता था;
हत विरही हरहर करता था;
उड़ती थी गोधूली।
लाना, लाना, सखि, तूली!
ज्यों ही अश्रु चिता पर आया
उग अंकुर पत्तों से छाया;
फूल वही वदनाकृति लाया,
लिपटी लतिका फूली!
लाना, लाना, सखि, तूली!

सिर-माथे तेरा यह दान,
हे मेरे प्रेरक भगवान!
अब क्या माँगू भला और मैं फैला कर ये हाथ?
मुझे भूल कर ही विभु-वन में विचरें मेरे नाथ।
मुझे न भूले उनका ध्यान,
हे मेरे प्रेरक भगवान!
डूब बची लक्ष्मी पानी में, सती आग में पैठ;
जिये उर्मिला, करे प्रतीक्षा, सहे सभी घर बैठ।
विधि से चलता रहै विधान,
हे मेरे प्रेरक भगवान!
दहन दिया तो भला सहन क्या होगा तुझे अदेय?
प्रभु की ही इच्छा पूरी हो, जिसमें सबका श्रेय।
यही रुदन है मेरा गान,
हे मेरे प्रेरक भगवान!

अवधि-शिला का उर पर था गुरु भार;
तिल तिल काट रही थी दृगजल-धार।