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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / पंचम सर्ग / पृष्ठ ६

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जाओगे तुम जहाँ, तीर्थ होगा वहीं;
मेरी इच्छा है कि रहो गृह-सम यहीं।"
प्रभु बोले--"कृत्कृत्य देव, यह दास है;
पर जनपद के पास उचित क्या वास है?
ऐसा वन निर्देश कीजिए अब हमें,
जहाँ सुमन-सा जनकसुता का मन रमें।
अपनी सुध ये कुलस्त्रियाँ लेती नहीं,
पुरुष न लें तो उपालम्भ देती नहीं।"
"कर देती हैं दान न अपने आपको,
कैसे अनुभव करें स्वात्म-संताप को।
वैदेही की जाति सदैव विदेहिनी,
वन में भी प्रिय-संग सुखी कुल-गेहिनी।
चित्रकूट तब तात, तुम्हारे योग्य है,
जहाँ अचल सुख, शान्ति और आरोग्य है।"
"जो आज्ञा कह राम सहर्ष प्रयाग से,
चित्रकूट की ओर चले अनुराग से।
दिखला आये मार्ग आप मुनिवर उन्हें,
मिली सूर्य की सुता धन्य धुनिवर उन्हें।
जल था इतना अमल कि नभ-सा नील था,
विभु-वपु के ही वर्ण-योग्य समशील था।
राजपुत्र भी कलाकार थे वे कृती,
धीर, धारणाधार, धुरन्धर, ध्रुवधृती।
लक्ष्मण लाये दारु-लताएँ तोड़ कर,
नौका निर्मित हुई उन्हीं को जोड़ कर।
सभी निछावर स्वावलम्ब के भाव पर,
सीता प्रभु-कर पकड़, चढ़ीं निज नाव पर।
ज्यों पुरेंन पर फुल्ल पद्मिनीं तर चली;
चले सहारा दिये हंस-सम युग बली।

करके यमुना-स्नान, बिलम वट के तले;
लक्ष्मण, सीता, राम विकट वन को चले।
वहाँ विविध वैचित्र्य, विलक्षण ठाठ थे;
अगणित आकृति-दृश्य, प्रकृति के पाठ थे।
"वन में अग्रज अनुग, अनुज हैं अग्रणी।"
सीता ने हँस कहा--"न हो कोई व्रणी।"
"भाभी, फिर भी गईं न आईं तुम कहीं,
मध्यभाग की मध्यभाग में ही रहीं!"
मुसकाये प्रभु, मधुर मोदधारा बही,--
"वन में नागर भाव प्रिये, अपना यही।
बीते यों ही अवधि यहाँ हँस-खेल कर
तो हम सब कृत्कृत्य, कष्ट भी झेल कर।"
"आहा! मैं तो चौंक पड़ी, यह कक्ष से,--
फड़ फड़ करके कौन उड़ा दृढ़ पक्ष से।
देखो, पहुँचा हाल कहीं का वह कहीं!
वैमानिक हो, किन्तु मनुज पक्षी नहीं।
ऊपर विस्तृत व्योम, विपुल वसुधा तले;
फिर भी, कैसे फाड़ फाड़ अपने गले--
वे तीतर नख-चंचु मार कर लड़ रहे;
कौन कहे, किस तुच्छ बात पर अड़ रहे।
यहाँ सरल संकुचित घनी वनवीथि है,
वनस्थली की माँग बनी वनवीथि है!
वनलक्ष्मी सौभाग्यवती फूले-फले,
झूले शिशु-सी शांति, पवन पंखा झले।
आगे आगे भाग रहा है मोर यह,
पक्षों से पथ झाड़, चपल चितचोर यह।
मचक मचक वह कीश-मण्डली खेलती,
लचक लचक बच डाल भार है झेलती!
नाथ, सभी कुछ त्याग, जान कर झूठ ही,
खड़े तपस्वी-तुल्य कहीं ये ठूँठ ही!"
"इन पर भी तो प्रिये, लताएँ चढ़ रहीं;
मानों फिर वे इन्हें हरा कर, बढ़ रहीं!"
"कहीं सहज तरुतले कुसुम-शय्या बनी,
ऊँघ रही है पड़ी जहाँ छाया घनी!
घुस धीरे से किरण लोल दलपुंज में,
जगा रही है उसे हिला कर कुंज में।
किन्तु वहाँ से उठा चाहती वह नहीं,
कुछ करवट-सी पलट, लेटती है वहीं।
सखि, तरुवर-पद-मूल न छोड़ो तुम कभी,
एक रूप हैं वहाँ फूल-काँटे सभी!
फैलाये यह एक पक्ष, लीला किये,
छाती पर भर दिये, अंग ढीला किये,--
देखो, ग्रीवाभंग-संग किस ढंग से,
देख रहा है हमें विहंग उमंग से।
पाता है जो जहाँ ठौर, उगता वहीं;
मिलता है जो जिसे जहाँ, चुगता वहीं।
अत्र तत्र उद्योग सर्व सुखसत्र है,
पर सुयोग-संयोग मुख्य सर्वत्र है।"
"माना आर्ये, सभी भाग्य का भोग है;
किन्तु भाग्य भी पूर्वकर्म का योग है।"
"प्रिये, ठीक है, भेद रहा है, नाम का,
लक्ष्मण का उद्योग, भाग्य है राम का।"
"नाथ, भाग्य तो आज मैथिली का बड़ा,
जिसको यह सुख छोड़, न घर रहना पड़ा।
वह किंशुक क्या हृदय खोलकर खिल गया,
लो, पलाश को पुष्प नाम भी मिल गया।
ओहो! कितनी बड़ी केंचुली यह पड़ी।
पवन-पान कर फूल न हो फिर उठ खड़ी!"
"आर्ये, तब भी हमें कौन भय है भला?
वह मरने भी चला, मारने जो चला।
अच्छा, ये क्या पड़े? बताओ तो सही;"
"देवर, सब सब नहीं जानते, बस यही।
विविध वस्तुएँ हमें यहाँ हैं देखनी,
पर इनसे क्या बनें न सुन्दर लेखनी?"
"ठीक, यहाँ पर शल्य छोड़कर शल गया,
नाम रहै पर काम बराबर चल गया।
मुस्तकगन्धा खुदी मृत्तिका है उधर,
बनें आर्द्रपदचिन्ह, गये शूकर जिधर।
देखो, शुकशिशु निकल निकल वह नीड़ से,
घुसता है फिर वहीं भीत-सा भीड़ से।