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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / प्रथम सर्ग / पृष्ठ ५

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देख भाव-प्रवणता, वर-वर्णता,
वाक्य सुनने को हुई उत्कर्णता!
तूलिका सर्वत्र मानों थी तुली;
वर्ण-निधि-सी व्योम-पट पर थी खुली।
चित्र के मिष, नेत्र-विहगों के लिए,
आप मोहन-जाल माया थी लिये।
सुध न अपनी भी रही सौमित्र को;
देर तक देखा किये वे चित्र को।
अन्त में बोले बड़े ही प्रेम से--
"हे प्रिये, जीती रहो तुम क्षेम से।
दुर्ग-सम्मुख, दृष्टि-रोध न हो जहाँ,
है सभा-मण्डप बना विस्तृत वहाँ।
झालरों में मंजु मुक्ता हैं पुहे,
माँग में जिस भाँति जाते हैं गुहे।
दीर्घ खम्भे हैं बने वैदूर्य के;
ध्वज-पटों में चिन्ह कुल-गुरु सूर्य के।
बज रही है द्वार पर जय-दुन्दभी,
और प्रहरी हैं खड़े प्रमुदित सभी।
क्षौम के छत में लटकते गुच्छ हैं,
सामने जिनके चमर भी तुच्छ हैं।
पद्म-पुंजों-से पटासन हैं पड़े,
और हैं बाघंबरों के पाँवड़े।
बीच में है रत्न-सिंहासन बना,
छन्न और वितान जिस पर है तना।
आर्यदम्पति राजते अभिराम हैं,
प्रकट तुलसी और शालिग्राम हैं!
सब सभासद शिष्ट हैं, नय-निष्ठ हैं;
छोड़ते अभिषेक-वारि वसिष्ठ हैं।
आर्य-आर्या हैं तनिक कैसे झुके,
आज मानों लोक-भार उठा चुके!
बरसती है खचित मणियों की प्रभा;
तेज में डूबी हुई है सब सभा!
सुर-सभा-गृह बिम्ब इसका ही बड़ा,
व्योम-रूपी काच में है जा पड़ा!
पंच-पुरजन-सचिव सब प्रमुदित बड़े;
माण्डलिक नरवीर कैसे हैं खड़े।
हाथ में राजोपहार लिये हुए,
देश-देश-विचित्र-वेश किये हुए।
किन्तु मित्र नरेश सब कब आ सके?
भरत भी न यहाँ बुलाये जा सके।
यह तुम्हारी भावना की स्फूर्ति है;
जो अपूर्ण कला उसी की पूर्ति है!
हो रहा है जो यहाँ, सो हो रहा,
यदि वही हमने कहा तो क्या कहा?
किन्तु होना चाहिए कब क्या, कहाँ,
व्यक्त करती है कला ही यह यहाँ।
मानते हैं जो कला के अर्थ ही,
स्वार्थिनी करते कला को व्यर्थ ही।
वह तुम्हारे और तुम उसके लिए,
चाहिए पारस्परिकता ही प्रिये!
मंजरी-सी अंगुलियों में यह कला!
देख कर मैं क्यों न सुध भूलूँ भला?
क्यों न अब मैं मत्त-गज-सा झूम लूँ?
कर-कमल लाओ तुम्हारा चूम लूँ!"
कर बढ़ा कर, जो कमल-सा था खिला,
मुस्कराई और बोली उर्मिला--
"मत्त-गज बनकर विवेक न छोड़ना,
कर कमल कह कर न मेरा तोड़ना!"
वचन सुन सौमित्रि लज्जित हो गये,
प्रेम-सागर में निमज्जित हो गये।
पकड़ कर सहसा प्रिया का कर वही,
चूम कर फिर फिर उसे बोले यही--
"एक भी उपमा तुम्हें भाती नहीं;
ठीक भी है, वह तुम्हें पाती नहीं।
सजग अब इससे रहूँगा मैं सदा;
अनुपमा तुमको कहूँगा मैं सदा!
निरुपमे, पर चित्र मेरा है कहाँ?"
"प्रिय, तुम्हारा कौन-सा पद है यहाँ?"
"भावती, मैं भार लूँ किस काम का?
एक सैनिक मात्र लक्ष्मण राम का।"
"किन्तु सीता की बहन है उर्मिला;
वाह, उलटा योग यह अच्छा मिला!
अस्तु, कुछ देना तुम्हें स्वीकार हो,
तो तुम्हारा चित्र भी तैयार हो।"
"और जो न हुआ?" गिरा प्रिय ने कही;
"तो पलट कर आप मैं दूँगी वही।"
होड़ कर यों उर्मिला उद्यत हुई,
और तत्क्षण कार्य में वह रत हुई।
ज्योति-सी सौमित्रि के सम्मुख जगी;
चित्रपट पर लेखनी चलने लगी।