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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / षष्ठ सर्ग / पृष्ठ २

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माँ ने न तनिक समझा-बूझा,
यह उन्हें अचानक क्या सूझा?
अभिषेक कहाँ, वनवास कहाँ?
है नहीं क्षणिक विश्वास यहाँ।
भावी समीप भी दृष्ट नहीं,
क्या है जो सहसा सृष्ट नहीं!
दुरदृष्ट, बता दे स्पष्ट मुझे--
क्यों है अनिष्ट ही इष्ट तुझे?
तू है बिगाड़ता काम बना,
रहता है बहुधा वाम बना।
प्रतिकार-समय तक दिये बिना,
छिप कर, कुछ अकधक किये बिना--
करता प्रहार तू यहाँ वहाँ,
धोखा देता है जहाँ तहाँ।
तू ने जो कुछ दुरदृष्ट, किया,
आभास स्वप्न में भी न दिया।
कुछ शमन-यत्न करते हम भी;
है योगसाध्य दुर्दम यम भी।"
नभ-ओर उर्मिला ने देखा,
थी ईर्ष्या-भरी दृष्टि-रेखा।
तब नभ भी मानों धधक उठा;
सन्ध्यारुणिमा-मिस भभक उठा।

रीता दिन बीता, रात हुई;
ज्यों त्यों वह रात प्रभात हुई।
फिर सूनी सूनी साँझ हुई,
मानों सब वेला बाँझ हुई।
उर्मिला कभी तो रोती थी,
फिर कभी शान्त-सी होती थी।
देता प्रबोध जो, सुनती थी,
मन में अतर्क्य कुछ गुनती थी।

उन माताओं की करुण-कथा,
देती थी दुगनी मनोव्यथा।
सुत गये तथा पति पड़े यथा,
रोने तक का अवकाश न था!
आँधी से उखड़े वॄक्ष-सदृश,
थे भूप शोक-हत जर्जर-कृश।
ज्यों हृतप्रसूना लतिकाएँ,
वे थीं समीप दायें-बायें।
ज्यों त्यों कर शोक सहन करके,
अंचल से वायु वहन करके
बोलीं प्रभुवरप्रसू तब यों,--
"हे नाथ, अधीर न हो अब यों।
तुमने निज सत्य धर्म्म पाला;
सुत ने स्वापत्य-धर्म्म पाला।
पत्नी पति-संग बनी देवी;
प्रिय अनुज हुआ अग्रज-सेवी।
जो हुआ सभी अविचित्र हुआ,
पर धन्य मनुष्य-चरित्र हुआ।
गौरव-बल से यह शोक सहो;
देखो हम सबकी ओर अहो!"
भूपति ने आँखें खोल कहा,--
"यह कौन है कि जो बोल रहा?
कौशल्ये, धन्य राम-मातः,
क्या कहूँ, हाय रे! धिक धातः!
यह शोक कहाँ तक रोकूँ मैं?
किस मुँह से तुम्हें विलोकूँ मैं?
हा! आज दृष्टि भी कहाँ गई?
वह बधू जानकी जहाँ गई।
सीता भी नाता तोड़ गई,
इस वृद्ध ससुर को छोड़ गई।
उर्मिला बहू की बड़ी बहन!
किस भाँति करूँ मैं शोक सहन?
उर्मिला कहाँ है, हाय बहू!
तू रधुकुल की असहाय बहू!
मैं ही अनर्थ का हेतु हुआ,
रविकुल में सचमुच "केतु" हुआ!
यदि राम न लौटेंगे वन से,
तो भेट न होगी इस जन से।
कैकेयि, भोग कर बलि मेरी,
राज्यश्री तृप्त रहे तेरी!"
दोनों सु-रानियाँ रोती थीं,
पति के पद-पद्म भिगोती थीं।
नृप राम राम ही रटते थे,
युग के समान पल कटते थे।
फिर भी सुमन्त्र हैं साथ गये,
गृह-दशा देख रघुनाथ गये।
अटकी थी आशा एक यही,
जो थी अब उनको जिला रही।
आशा अवलम्बदायिका है,
क्या ही कल-गीत-गायिका है।
वह आप क्यों न नाता तोड़े,
पर कौन है कि उसको छोड़े?

ऊँचे अट्टों पर चढ़ चढ़ कर--
सब ओर पथों में बढ़ बढ़ कर,
रथ-मार्ग देखने लगे सभी,
फिर आवें राघव कहीं अभी!
पर यदि रघुनाथ लौट आते--
तो प्रथम ही न वे वन जाते।
लौटे सुमन्त्र ही बेचारे,
अनुरोध-तर्क भी सब हारे।

कर में घोड़ों की रास लिये,
निज जीवन का उपहास किये;
होकर मानों परतन्त्र निरे,
सूना रथ लिये सुमन्त्र फिरे।