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साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / सप्तम सर्ग / पृष्ठ १

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सप्तम सर्ग
’स्वप्न’ किसका देखकर सविलास
कर रही है कवि-कला कल-हास?
और ’प्रतिमा’ भेट किसकी भास,
भर रही है वह करुण-निःश्वास?

छिन्न भी है, भिन्न भी है, हाय!
क्यों न रोवे लेखनी निरुपाय?
क्यों न भर आँसू बहावे नित्य?
सींच करुणे, सरस रख साहित्य!

जान कर क्या शून्य निज साकेत,
लौट आये राम अनुज-समेत?
या उन्हीं के अन्य रूप अनन्य,
ये भरत-शत्रुघ्न दोनों धन्य?
क्यों हुए हैं ये उदास अशान्त?
शीघ्र यात्रा ने किया है क्लान्त?
या कि विधु में ज्यों मही की म्लानि,
दूर भी विम्बित हुई गृह-ग्लानि?

"सूत, रथ की गति करो कुछ मन्द,
अश्व अपने से चलें स्वच्छन्द।
अनुज, देखो, आ गया साकेत,
दीखते हैं उच्च राज-निकेत।
काम्य, कर्बुर, केतु-भूषित अट्ट,
गगन में ज्यों सान्ध्य घन-संघट्ट।
अवनि-पूण्याकृष्ट, लोक-ललाम,
मौन खिंच आया यथा सुरधाम!
किन्तु करते हाय! आज प्रवेश,
काँपता है क्यों हृदय सविशेष!
जान पड़ता है, न जाकर आप,
मैं खिंचा जाता, खिंचे ज्यों चाप!
जब उमड़ना चाहिए आह्लाद,
हो रहा है क्यों मुझे अवसाद?
निकट ज्यों ज्यों आ रहा है गेह,
सिहरती है क्यों न जानें देह?
बन्धु, दोनों ओर दो तुम ध्यान,
आ गये ये वाह्य नगरोद्यान।
हो रही सन्ध्या अभी उपलब्ध,
किन्तु मानों अर्द्धनिशि निस्तब्ध!
नागरिक-गण-गोष्ठियों से हीन,
आज उपवन हैं विजन में लीन।
वृक्ष मानों व्यर्थ बाट निहार,
झँप उठे हैं झींम, झुक, थक, हार!
कर रही सरयू जिसे कुछ रुद्ध,
बह रही है वायु-धारा शुद्ध।
पर किसे है आज इसकी चाह?
भर रही यह आप ठण्डी आह!
जा रहा है व्यर्थ सुरभि-समीर,
हैं पड़े हत-से सरों के तीर!
देख कर ये रिक्त क्रीड़ाक्षेत्र,
हैं भरे आते उमड़ कर नेत्र।
याद है, घुड़दौड़ का वह खेल,
हँस मुझे जब हाथ से कुछ ठेल,
हय उड़ा कर, उछल आप समक्ष,
प्रथम लक्ष्मण ने धरा ध्वजलक्ष?
दीख पड़ते हैं न सादी आज,
गज न लाते हैं निषादी आज,
फिर रही गायें रँभाती दूर,
भागते हैं श्लथ-शिखण्ड मयूर।
पार्श्व से यह खिसकती-सी आप,
जा रही सरयू बही चुपचाप।
चल रही नावें न उसमें तैर,
लोग करते हैं न तट पर सैर।
कुछ न कुछ विघटित हुआ विभ्राट,
विप्र-पंक्ति-विहीन हैं सब घाट।
क्या हुआ सन्ध्यार्ध्य का वह ठाठ?
सुन नहीं पड़ता कहीं श्रुति-पाठ!
ये तरणि अपने अतुल कुल-मूल,
सुरस देते हैं जिन्हें युग कूल,
उदित थे जिस लालिमा के संग
अस्त भी हैं रख वही रस-रंग।
आयँगे फिर ये इसी विध कल्य,
जन्म-जीवन का यही साफल्य।
नमन तुमको देव, निज कुलकेतु,
तुम तपो चिरकाल इस भव-हेतु।
जानते हैं अनुज, अपने ज्येष्ठ,
मुक्ति से आवागमन यह श्रेष्ठ।
धड़कता है किन्तु मेरा चित्त,
भड़कता है भावना का पित्त।
निकट हो दिनरात-सन्धि सहर्ष,
किन्तु जँचता है मुझे संघर्ष।
दीखता है अन्धकार समीप,
भीत मत हो, आर्य हैं कुल-दीप।"

तब कहा शत्रुघ्न ने भर आह--
"था कहाँ मेरा विचार-प्रवाह!
घर पहुँच कर, कल्पना के साथ,
हो रहा था मैं सहर्ष सनाथ।
पूछते थे कुशल मानों तात;
प्रेम-पूर्वक भेटते थे भ्रात।
बढ़ रहा था जननियों का मोद;
हँस रही थीं भाभियाँ सविनोद।
कह यहाँ के वृत्त सहचर बाल,
पूछते थे सब वहाँ के हाल।
प्राप्त मातुल से हुए जो द्रव्य,
था अमात्यों को वही सब श्रव्य।
सब हमें नव, हम सभी को नव्य,
हो रहे थे ज्ञात कितने भव्य।
वेष-भाषा-भंगियों पर हास्य
कर रहे थे सरस सबके आस्य।
हम अतिथि-से थे स्वगृह में आज,
सम्मिलित था क्या अपूर्व समाज।
हो रहा था हर्ष, उत्सव, गान,
और सबका संग भोजन-पान।
पर निरख अब दृश्य के विपरीत,
हो उठा हूँ आर्य्य, मैं अति भीत।
जान पड़ता है, पिता सविशेष
रुग्ण होकर पा रहे हैं क्लेश।"