भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सितम ही करना जफ़ा ही करना / दाग़ देहलवी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-लुत्फ़ कभी न करना
तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी न करना

कहाँ का आना कहाँ का जाना वो जानते ही नहीं ये रस्में
वहां है वादे की भी ये सूरत कभी तो करना कभी न करना

हमारी मय्यत पे तुम जो आना तो चार आँसू बहा के जाना
ज़रा रहे पास-ए-आबरू भी कहीं हमारी हँसी न करना

वो इक हमारा तरीक़-ए-उल्फ़त कि दुश्मनों से भी मिल के चलना
ये एक शेवा तेरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना