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सुना है / हरीश भादानी

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सुना है-
इन दिनों सपने हमसे बहुत नाराज़ हैं !
एक अप्सरा-सी गंध ने
शिकायत की हवाओं से कि-
किस तरह फेरे फिरें
नीची गली !
घटाओं की आधी खुली लट नें
मुँह फेर सावन से शिकायत की कि-
किस तरह गरजें-बरसलें उस धरा
जो धूप से तन-मन जली !
लुटी बारात सा हमारा गाँव
और यह आलम !
इसीलिये शायद
सुना है-
इन दिनों परचम हमसे बहुत नाराज़ हैं !
हमारे
साँस के घर के इस ऊपरी आकाश में
इतने झरोखे हैं कि-
धूप के झरने कभी रुकते नहीं
और आँधियों की बाढ़ भी
कभी थकती नहीं, बँधती नहीं,
डॉ हमारे गाँव
सावन भी गहरता है
मगर उदासी-सा
और बिजलियाँ भी कौंध जाती हैं
बिना मौसम
लेकिन हमारी पीठ में,
इसीलिये शायद
सुना है-
इन दिनों सरगम हमसे बहुत नाराज है !
माँ बाप बन
सारे अभाव पोषे जा रहे हैं
दूध पीड़ा का
पिलोये जा रहे हमको,
ये उलाहनों से सभी भाई,
आँसुओं की धारा सी कुआँरी बहन
यह खून का सम्बन्ध
ये नमकीन आशीसें-
जिन्हें हम छोड़ना नहीं चाहते
इसीलिये शायद
सुना है-
इन दिनों सभी अपने हमसे बहुत नाराज हैं !