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सुनो, ओ लैकेदाइमोनियनों के बादशाह ! / कंस्तांतिन कवाफ़ी / सुरेश सलिल

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क्रातिसिकिलिया ने कोई मौक़ा नहीं दिया लोगों को
अपने दर्दो-नाले को भाँप पाने का :
आनबान भरी ख़ामोशी के साथ आगे बढ़ी
ख़ामोश चेहरे पर कोई नक्श नहीं
ग़म का, दर्द का ।

तब भी, पल भर को रोक नहीं पाई वह ख़ुद को :
सिकन्दरिया के लिए तैयार खड़े
खटारा जहाज़ पर सवार होने से पहले
बेटे को ले गई पोसिदोन[1] के मन्दिर

और वहाँ जब वे दोनों तन्हा थे
[वह ‘‘बहुत व्यथित’’ था, प्लूतार्क ने लिखा है,
‘‘बहुत ही विचलित’’]
उसे प्यार से सीने से लगाया, माथा चूमा उसका...

मगर तभी उसकी ज़िन्दादिली ने पलटी खाई
फिर अपनी ठवन हासिल की
और उस शानदार औरत ने क्लिओमेनिस से कहा,

‘‘सुनो, ओ लैकेदाइमोनियनों के बादशाह,
हम जब बाहर निकलें, कोई भी हमें आँसू बहाते
या स्पार्ता की शान के ख़िलाफ़
किसी भी तरह पेश आते न देखने पाए ।
कम से कम इतना तो हमारे बस में है ही
आगे ऊपरवाले की मर्ज़ी।’’

और सवार हो गई वह जहाज़ पर
‘ऊपर वाले की मर्ज़ी’ जहाँ कहीं ले जाए !

[1929]

यह कविता पिछली कविता के ही क्रम में है ।

शब्दार्थ
  1. यूनानी पौराणिकी में समुद्र, भूकम्प और घोड़ों का देवता,जो रोमन पौराणिकी में ‘नेपच्यून’ नाम से जाना जाता है।