भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सूखै गळो पग बळै म्हारा / सांवर दइया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सूखै गळो पग बळै म्हारा
ऐ जेठ-असाढ तळै म्हारा

छीयां लारै भाजै औ मन
नित नुंवा सुपना छळै म्हारा

आ पीड़ नित सींचै काळजो
आखर आक-सा पळै म्हारा

ओजूं चेतैला आ धूणी
ऐ बोल सुणलो फळै म्हारा

देवैला हिवड़ै नै उजास
आंख सूं आंसू ढळै म्हारा