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सूरज दादा / बालकृष्ण गर्ग

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सूरज दादा लाते धूप,
दमका करता उनका रूप।
लगते सोने का-सा थाल,
सुबह-शाम दिखते हैं लाल

रोज रोशनी करते खूब,
कभी ण जाते इससे ऊब।
दिन-भर करके अपना काम,
करें रात को वे आराम।

देते हमें यही संदेश-
‘नियमित जीवन काटे क्लेश।
आलस सबसे बुरी बला,
मेहनत सबका करे भला।
[नन्हें तारे, अगस्त 1984]