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सैकत / शंख घोष

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अब आज कोई समय नहीं बचा
ये सारी बातें लिखनी ही पड़ेंगी, ये सारी बातें
कि निस्तब्ध रेत पर
रात तीन बजे का रेतीला तूफ़ान
चाँद की ओर उड़ते-उड़ते
हाहाकार की रुपहली परतों में
खुल जाने देता है सारी अवैधता
और सारे अस्थि-पंजर की सफ़ेद धूल
अबाध उड़ती रहती है नक्षत्रों पर
एक बार, सिर्फ़ एक बार छूने की चाहत लिए.

और नीचे दोनों ओर
केतकी के पेड़ों की कतारों के बीच से होती हुई
भीतर की सँकरी-सी सड़क जिस तरह चली गई है
अजाने अटूट किसी मसृण गाँव की ओर
वह अब भी ठीक वैसी ही है यह कहना भी मुश्किल है
फिर भी यह सजल गह्वर पूरे उत्साह से
रात में यह विराट समुद्र जितनी दूर तक
सुनाता है अपना गर्जन

वहाँ तक मत जागना सोते हुए लोगो !
तुम सोए रहो, सोए रहो
उस गाँव पर बिखर जाए निःशब्द सारी रेत
और तुम्हें भी अलक्षित उठा ले निःसमय
अंक में रख ले अन्धेरे या फिर
अन्धेरे-उजाले की जलसीमा पर
रख ले पद्म के कोमलभेद में
जन्म के होंठ छूकर आ धमके मृत्यु

आज अब और समय नहीं है
सारी बातें आज लिखनी ही पड़ेंगी
ये सारी बातें, ये सारी ...!

मूल बंगला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी