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सोचै मन मैं डीकरी / मनोज चारण 'कुमार'

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टूटी दैळी,
चौखट टूटी,
टूटी छान अर छपरो भी,
पण नीं टूटी ओजूं तांई,
बेड़्यां
समाज री
जात री
बेटी होवण री।
कुळ-जात-गोत
री झूठी बातां,
घोर अंधारी काळी रातां,
दान-दायजै री चिंता घुळती,
मन मांय कळपती
ठंडै गातां।
चिंत्या रै आंगणियै,
पळती बेलड़्यां
मन मांय निसासा नाखै,
गरीब री झूंपड़ी मांय
रूप रंग अर जोबन,
राम रूसै
जद इज फळापै।
घर सूं बारै निकळतां
डर लागै आजकलै,
गरीब री गोर नै तो,
सगळा इज सूनी समझै।
सगत्यां अर सतियां रै देस मैं,
कन्या रो जलम
झुका देवै बाप रा कांधा,
मन मसोस'न सोचै बेटी
रामजी खेल रचावै,
गरीब-गुरबै नै
अमीरां री पोळ नचावै।
टूटेड़ी टपरी मांय बैठी,
मन मांय सोचै बेटी,
रामजी म्हां पर राजी होवै,
म्हारै बापजी री चिंत्या मेटै
जे किंया ई पार लागै,
भगवान !
किंया म्हारा भाग जागै।
टूटेड़ी टपरी मांय
बिचार करै लाडली
देख हवा जमानै री,
घर सूं बारै निकळती डरपै,
घर मांही बैठी सोचै,
बेट्यां री गत देख,
माँ भारती कळपै।।