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सोने की खटिया रूपे केर मचिया / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

सोने की खटिया रूपे केर मचिया, ईंगुर लगल चारो पाट[1] हे।
एक हाथ तेल, दूसर हाथ अबटन[2] सीता सिरहनमा[3] लेले ठाढ़[4] हे॥1॥
गँगा किंरियवा[5] तूहुँ खाहु[6] जी सीता, तब धरू पलँग पर पाँव हे।
गंगा हाथ लिहलन जबहिं सीता देइ, गंगा हो गेलन जलबाय[7] हे॥2॥
येह किरियवा सीता मैं न पतिआऊँ[8] सुरुज किरियवा तूँ खाहु हे।
जबहिं सीता हे सुरूज हाथ लिहलन[9] सुरूज हो गेलन छपित हे॥3॥
येहु किरियवा सीता मैं न पतिआऊँ, अगिन[10] किरियवा तूँ खाहु हे।
जबहिं सीता देइ अगिन हाथ लिहलन, अगिन होलइ[11] जरिछाय[12] हे॥4॥
कहथिन रामचंदर सुनु देइ सीता जी, अब हम दास तोहार हे॥5॥
अइसन पुरूख[13] के जात[14] बनावल, झूठो लगावे अकलंक[15] हे।
फाटत[16] भुइयाँ[17] ओकरो में[18] समयतीं[19] मुहमाँ न देखतीं तोहार हे॥6॥

शब्दार्थ
  1. चारो पाये में
  2. उबटन
  3. खाट का वह हिस्सा, जिधर सिर रहता है
  4. खड़ी
  5. गंगा की शपथ
  6. खाओ
  7. अदृश्य। बाय = वायु
  8. विश्वास करूँ
  9. लिया
  10. अग्नि
  11. हो गई
  12. जलकर राख हो गई
  13. पुरुष
  14. जाति
  15. कलंक, दोष
  16. फट जाती
  17. पृथ्वी
  18. उसी में
  19. प्रवेश कर जाती