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सौतेली दुनिया / मुइसेर येनिया

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रात के भीतर कोई नहीं है
सिवा उस सफ़ेद दीवार के जिसे मैं छूती हूँ
अपनी आवाज़ से

अन्धकार जैसे धागे से बँधी एक गेंद है
यह ज़ख्म है मेरे भीतर

रात के भीतर कोई नहीं है
मृत हो चुकी मेरी देह पुनर्जीवन चाहती है

अन्धकार से विकृत मेरी रोशनी
वे इसे दुनिया कहते हैं
यह चीज़ बिना रुके
दौड़ रही है मेरी तरफ

मैंने मधुमक्खियों की ख़ामोशी की
परवाह की रात और दिन
मेरे कान दीवारें हैं जो अन्दर नहीं आने देते
इस दुनिया को

मैंने अपने दिल के शीशे को साफ़ किया
मेरी देह में उसने दाग छोड़ दिए

दिल ने जो भी दिखाया
वह वक़्त था !
मैं निर्वस्त्र थी यहाँ
और रोशनी ने उतार दी थी
मेरी त्वचा

यह दुनिया
जहाँ मैं आई
जैसे मैं बच्चा होना चाहती थी
उस स्त्री का जिसने मुझे कभी जन्म नहीं दिया
— यह सौतेली है ।