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स्मृतियाँ- 1 / विजया सती

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किस एक स्मृति से है मन की संपन्नता का नाता?
पूछती हूँ अपने-आप से
कितना संपन्न था पहले यह मन
चाँदनी चौक की तंग गलियों में घूमता पिता के साथ
दो अक्तूबर से शुरू होती थी खादी पर छूट
और हम चुनते थे उनके साथ छोटे-छोटे रंगीन टुकड़े
कुछ न कुछ बना ही देती थी माँ -
मेरी सुन्दर-सी फ्राक, कुर्सी की गद्दी का खोल या फिर मेजपोश ही
थकता कहाँ था यह मन
ऊँची पहाड़ी के मंदिर तक उड़ा चला जाता था
स्वस्थ पिता की उँगलियाँ थाम नवरात्र के मेले में
फतेहपुरी के भीड़ भरे बाज़ार की हलचल के बीच
खील-बताशे खरीदता दिवाली के आसपास!
उस सम्पन्नता का है कहीं सानी?
जब झड़ते थे प्रश्न बेहिसाब
बचपन की फैली आँखों से
उत्तर सब थे पिता के पास
और था कहानियों से भरा बस्ता
जिसमें झाँकते थे -
टाम काका, वेनिस का सौदागर और पात्र पंचतंत्र के
यमुना किनारे की रेत से कभी बटोरते हम काँस फूल
नंगे पाँव ही हो आते थे उनके साथ
छोटी-सी क्यारी में बोए मक्का तोड़ने
या उलझी लता से खींचते थे साथ मिलकर
नरम हरी तोरियाँ!
सुबह जागती-सी नींद में गूँजता स्वर
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
संध्या वेला को त्र्यम्बकं यजामहे का विशुद्ध अटूट क्रम
यह है पिता के साथ की समृद्ध दुनिया अब भी मेरे भीतर

बहुत बढ़-चढ़ तो गई ही है बाहर भी सब ओर
मेरे आस-पास की दुनिया
सूना रहता ही कहाँ है
कामकाजी अभिनय से भरा जीवन-मंच?
मुश्किल से मिले निपट अकेले क्षणों में कभी
याद करना बीते हुए माँ-पिता की दुनिया में अपनी व्याप्ति
और खो देना समूची रिक्तता
लगता नहीं
है कहीं इस सम्पन्नता का कोई सानी!