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स्वप्नरूपेण / उत्पल बैनर्जी / मंदाक्रान्ता सेन

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मुझे विश्वास है कि तुम कर सकती हो।

तुमने निहायत सस्ती
सिंथेटिक साड़ी पहन रखी थी
हाथ में था प्लास्टिक का गुलाबी पैकेट
कलाई में केवल शाखा-पला’
और घिस चुकी हवाई चप्पल पैरों में
लगता है तुम्हें सेफ़्टिपिन बहुत पसंद है
लगता है, तुमने कुछ और पसंद करने के बारे में
कभी सोचा ही नहीं।

समझ में आ जाता है कि
तुम विज्ञान नहीं जानती, कविता भी नहीं,
गाने या कि अल्पना रचना भी तुम्हें नहीं आता
(जो ये सब जानते हैं वे कुछ तो उजले दिखते हैं)
तुममें चमक नहीं, चेहरे की त्वचा खुरदुरी।
यहाँ तक कि टिकिट लेकर
खुल्ले पैसों का हिसाब तक नहीं कर पातीं
कंडक्टर मुँह बिचकाता है।
तुम्हारे चेहरे पर उभर आता है आतंक
और फटे होंठों पर अर्थहीन हँसी।

सब तुम्हारी उपेक्षा कर रहे थे
और किसी तरह तुम बस से उतर पाईं
अच्छा कहो, अब तुम क्या करोगी ... घर जाओगी
तुम्हारा पति घर पर नहीं है
बच्चे भी नहीं, अच्छा-बुरा खाना बनाओगी कुछ?
वह भी तुम्हें शायद ठीक से नहीं आता!
तेल नहीं है, केवल दो आलू पड़े हैं
यह सब कहने से क्या होता है!
जो क़ाबिल हैं, अन्नपूर्णा,
वे दाल-भात को भी अमृत बना देती हैं

रात ढलने पर एक-एक कर
तुम्हारा संसार घर लौट आया
खाना हुआ और सोने का इंतज़ाम भी
मिलन भी हुआ और तुम कुछ भी नहीं कर सकीं।
फिर आधी रात को तुमने
पति और संतानों के चेहरों को
चुपके से छुआ
और वे स्वप्न में नीले पड़ गए।

मैंने कहा था, तुम कर सकती हो
बस किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया।