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स्वप्न / ज़िबा शिराज़ी

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एक रात मैंने सपना देखा -
कि मैं बादलों के बीच विचर रही हूँ
कि मैं आसमान में दौड़ लगा रही हूँ
कि मैं एक अकेली मुस्कुराहट के लिए दो सितारे तोड़ लाई हूँ
मैंने चाँद के घर में छिटकी चाँदनी देखी
और यूँ ही चहलकदमी करते हुए मैं पहुँच गई सूर्य तक।

मैंने बादलों की छाँव में बरसती बारिश देखी
और छू लिया आकाशगंगा का छोर
मैंने सब कुछ देख लिया
और नाप ले लिया अनंत व्योम का।

किन्तु मैंने अभी तक
प्रेम से सुन्दर कुछ भी नहीं देखा
भाग्य की कृपा है कि मैं स्वर्ग की सैर कर आई
और स्वयं से प्रश्न किया-'वह कौन है जिसने हमें ढाला है?'
कौन है वह जो लिखता ही जाता है मनुष्यता की कथायें
और हमें सिखलाए जा रहा है कि अच्छा क्या है, बुरा क्या?

अब जबकि मैं
स्वर्ग के रहवासियों के साथ कर आई हूँ संवाद
और सुनकर आई हूँ हजारों ज़िन्दगियों का कथासार
सब यही कहते हैं कि चलता ही रहता है जीवन
तब भी
जब दिन होते हैं बुरे
और तब भी जब दिवस होते हैं प्रसन्नता से परिपूर्ण।
स्वप्नों का क्या कहा जाय
वे तो होते हैं मात्र स्वप्न
और जीवन चलता ही रहता है अविराम
एक दिन जल की तलाश में भटकते-भटकते
मरीचिका-सा चुक जाता है जीवन राग।

जब से खुली है नींद
विचारों का पीछा किए जा रही हूँ
जिसको भी देखा है; जिससे भी हुआ है संवाद
उन सभी के लिए लाई हूँ एक समाचार।

मैं तुम्हारे कानों में फुसफुसाकर
जो सुना है, वही कुछ कहना चाहती हूँ
इसलिए
सारे प्रेमियों के लिए यही है छोटा-सा संदेश-
कि 'आई लव यू' कहने से
आज तक कभी नहीं हुई है किसी की मौत।


अँग्रेज़ी से अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह