भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

स्वामिनी! मेरी सुधि लीजै / स्वामी सनातनदेव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

राग विलासखानी, तीन ताल 23.6.1974

स्वामिनी! मेरी हूँ सुधि लीजै।
अपनी ही कोउ चेरि जानिके कछु तो करुना कीजै॥
तुव पद ही निज निधि नित मेरे, तिनको सेवा दीजै।
इनसों बिछुरि सहीं बहु साँसति, छिन-छिन काया छीजै॥1॥
भटकी बहुत-बहुत मैं स्वामिनि! यह मन कहुँ न पतीजे[1]
तुव पद ही अवलम्बन मेरे, तिन की रति मति भीजै॥2॥
चहों न रिधि-सिधि, भुक्ति-मुक्ति कछु, कहा इनहिं लै कीजै।
तुव पद-रति ही गति बस मेरी, माँगेहुँ और न दीजै॥3॥
जैसी भी हूँ सदा तिहारी, औगुन दृष्टि न दीजै।
अपनीकों अपनाय लाड़िली! ज्यों चाहहु त्यों कीजै॥4॥

शब्दार्थ
  1. विश्वास करे