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हँसि हँसि लिखथ पाँती बाँचहु हो भइया / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

हँसि हँसि लिखथ[1] पाँती[2] बाँचहु[3] हो भइया।
चंपा के चोरवा[4] के दीहऽ[5] तूँ सजइया॥1॥
रउदा[6] में रहतन जयतन रउदाइए।
घममा[7] में रहतन जयतन पिघलाइए॥2॥
सरदी के मारे चोर जयतन सरदाइए।
अँचरा में बाँधब रहतन लोभाइए॥3॥

शब्दार्थ
  1. लिख रही है
  2. पत्र, चिट्ठी
  3. पढ़ो
  4. चोर की
  5. देना
  6. धूप, रौंद
  7. धूप, घाम