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हँस सकती है स्त्री अकेले में / रवीन्द्र दास

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हँस सकती है स्त्री अकेले में
अकेले में रो भी सकती है
अकेले में भी स्त्री अकेली नहीं होती
किसी के साथ होते हुए भी हो सकती है अकेली.
अकेली स्त्री की रची हुई दुनिया
लेने लगती है जब शक्ल
किसी मुकम्मिल दुनिया की
चिहूँक पड़ते हैं पारम्परिक किस्म के दुनियादार
अचानक
जबकि तय होते थे ये लोग
नष्ट-भ्रष्ट हो जाने की संभावना पर
अकेली स्त्री के
अक्सर देखा जा सकता है इन्हें
चेतावनी देते हुए स्त्री को
अकेला कर देने की
हालाँकि यह भी हद नहीं
बेहद है दुनिया, मानो बहता पानी
ढाँचे में व्यवस्थित समाज
सीढ़ीदार
और काई लगे घाटों से सुसज्जित कोई तालाब
स्त्री वहाँ नहाने क्यों नहीं जाती
क्यों नहीं गिरती फिसलकर
मदद के लिए क्यों नहीं पुकारती स्त्री.