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हमारे राष्ट्रपति की परेशानी क्या है? / अहमेद फ़ौआद नेग़्म / राजेश चन्द्र

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मैं नहीं घबराता, और कहता ही रहूँगा
वह बात, जिसके लिए ज़िम्मेदार हूँ मैं
कि राष्ट्रपति एक दयालु आदमी हैं

रात-दिन मसरूफ़ ही रहते हैं वे जनता के लिए
मसरूफ़, उनसे पैसों की उगाही करने में
बाहर, स्विट्ज़रलैंड में, उन्हें जमा कर रहे हैं वे
हमारे लिये गुप्त बैंक खातों में
बेचारे, व्यथित रहते हैं हमारे भविष्य के लिए

आह, क्या तुम देख नहीं पा रहे उनकी दयालुता को?
पूरी निष्ठा और सदाशयता के साथ
वे भूखा रखते हैं तुम्हें,
ताकि वजन कम रहे तुम्हारा

और हे कमाल लोगो !
तुम हो कि मरते रहते हो निवाले के लिए
हा री मूढ़ता ! तुम बात करते हो ‘बेरोज़गारी‘ की
और इस बारे में भी कि
स्थितियाँ किस तरह होती जा रही हैं बेहद गम्भीर

भलामानुष, बस, देखना चाहता है आपको आराम में
सोचो कि इससे पहले क्या कभी
इस क़दर बोझिल हुआ करता था आराम???
और ये कानाफूसियां विश्रामगृहों को लेकर
आख़िर क्या सोच कर कहते हैं वे
राजनीतिक काराग़ार इन्हें??
आखि़र ज़रूरत ही क्या है आपको
इतना सशंकित होने की?

वे तो बस इतना चाहते हैं कि आनन्द लें
आप भी इस ‘कुर्सी‘ का, मगर अदब के साथ
इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि
यह सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारा ही गुनाह है !!
क्या हम दे नहीं सकते
उनको ‘टैफ़लॉन‘ की एक कुर्सी ख़रीद कर?

कसम से, आप ग़लत बर्ताव कर रहे हैं
उस दीन-हीन आदमी के साथ
उसने अपनी ज़िन्दगी लगा दी किसके लिए?
यहाँ तक कि तुम्हारा निवाला तक,
उसे ही निगलना पड़ता है तुम्हारे लिए !

वह भकोसता जा रहा है,
जो कुछ भी पाता है सामने
आखि़र परेशानी क्या है हमारे राष्ट्रपति की?

अँग्रेज़ी से अनुवाद : राजेश चन्द्र