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हमें भी ढाई आखर का अगर संज्ञान हो जाए / शेष धर तिवारी

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हमें भी ढाई आखर का अगर संज्ञान हो जाए
वही गीता भी हो जाए वही कुरआन हो जाए

मजाज़ी औ हक़ीक़ी का अगर मीज़ान हो जाए
मेरा इज़हार यारों मीर का दीवान हो जाए

जला कर ख़ाक करना, कब्ल उसके ये दुआ देना
कि मेरा जिस्म सारा खुद ब खुद लोबान हो जाए

खुदा को भूलने वालों तुम्हारा हस्र क्या होगा
खुदा तुमसे अगर मुह मोड ले, अनजान हो जाए

सभी घर मंदिर-ओ-मस्जिद में खुद तब्दील हो जाएँ
अगर इंसानियत इंसान की पहचान हो जाए

परिंदे मगरिबी आबो हवा के “शेष” शैदा हैं
कहीं ऐसा न हो अपना चमन वीरान हो जाए