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हम विधायक की बेटी के लिए कविताएं नहीं लिखेंगे / राजेन्द्र देथा

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जिस दिन हमारी आजादी होगी चूं तक करने की
उस दिन हम हमारे मालिक से कह ही देंगे
खुशी के मारे,लज्जा को बुआरे -
"सेठ जी आटा दे दो,चने बिकते ही वापिस दे देंगे"

जिस दिन हमारी आजादी होंगी-
हम गांव में रात्रि चौपाल में आए मंत्री जी को
राजी कर ही लेंगे,उधार गोठ करके
उन्हें मना ही लेंगे,बेंक से कर्जा दिलवाने के लिए

जिस दिन हमारी आजादी होंगी
हम जी भर गले लगाएंगे उन प्रेमिकाओं को
जिन्हें चाचा के इलाज के समय हाथ में हाथ लिए
छोड़ आए थे खेत के अंतिम सिरे पर सूर्य अस्त के वक़्त

जिस दिन हमारी आजादी होंगी
हम मुक्ति के गीत गाएंगे
हम रात पूरी हथाई करेंगे
उस दिन खेत नहीं जायेंगें

जिस दिन हमारी आजादी होंगी
हम नहीं लिखेंगे कविताएं धर्म पर
आरक्षण पर, विधायक की बेटी पर
हम उस दिन कुछ भी नहीं लिखेंगे
हम उस दिन आटा सहेजेंगे
हम कुछ डिब्बे लायेंगे,धनिया सजाएँगे
बेसन को ऊपर वाले आले में ही सजाएँगे
और नमक!
नमक तो मां ही रखेगी
वह उसे बहुत प्यार करती है।

जिस दिन हमारी आजादी होंगी
हम उस दिन खेत नहीं जाएंगे
हाँ सच में!
हम उस दिन दशी-पक्कड़ खेलेंगे!