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हम हक़ीक़त ही रहे आप मगर ख़्वाब हुए / रवि सिन्हा

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हम हक़ीक़त ही रहे आप मगर ख़्वाब हुए ।
मुझ तसव्वुर[1] की ज़मीं आप ही शादाब[2] हुए ।

बस के साहिल[3] की तरफ़ खिंच के चले आते हैं
हम समन्दर थे मगर इश्क़ में पायाब[4] हुए ।
 
फ़र्क़ करना तो मगर आये है सूरज को भी
हम तो पत्थर ही रहे और वो महताब हुए ।

एक ही दुख का नगर मुख़्तलिफ़ मन्ज़र देखे
नज़रें वीरान हुईं चश्म वो सैलाब हुए ।

ये महारत कि तवारीख़[5] में साकित[6] सदियों
हिन्द में ख़ल्क़[7] हुए दहर[8] में गिर्दाब[9] हुए ।

आज बाज़ार में पहुँचे तो कल के कोहे-गिराँ[10]
इस तबो-ताब[11] में इक तश्त-ए-सीमाब[12] हुए ।

क़त्ल हो आयें अगर फ़ैज़ हों, ग़ालिब डूबें
अब जो दुश्नाम[13]-ज़ुबाँ साहिबे-आदाब[14] हुए ।

शब्दार्थ
  1. कल्पना, ख़याल (imagination)
  2. हरा-भरा, सरसब्ज़ (green, verdant)
  3. किनारा (shore)
  4. उथला पानी, जो गहरा न हो (shallow)
  5. इतिहास (histories)
  6. निश्चल, गतिहीन (at rest)
  7. अवाम (people)
  8. युग, काल (era)
  9. भँवर (vortex)
  10. बड़े पहाड़ (big mountains)
  11. चमक दमक (razzle-dazzle)
  12. पारे की तश्तरी (a saucer full of mercury)
  13. ग़ाली (abuse)
  14. शिष्टाचार, तहज़ीब (culture)