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हरिद्वार में गंगा किनारे / जय छांछा

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सुदूर पश्चिम क्षितिज पर
जब सूरज होने लगता है अस्त
स्वत: ही शुरू हो जाता है लघु कुंभ मेला
हरिद्वार में गंगा किनारे ।

योगियों के लयबद्ध स्वर में
उच्चारित मंत्रों की गुंजन सुनाई पडती है हवा में
घंटा, चिमटे, ड्रम, बिगुल और
शंखध्वनि के मीठे संगीत से
आस्था की ख़ुशबू फैली रहती है गंगा किनारे
फिर भी, निश्चिंत निरंतर बहती रहती है गंगा
जैसे कुछ हुआ ही न हो, दुनिया को ये आभास दिलाते हुए ।

वास्तव में हरिद्वार की हर की पैड़ी
गोधूलि बेला में
एकाएक आकर्षण का केंद्र बिंदु बन जाती है
और,
असमानांतर दृश्यों के बीच
श्रद्धालु, आगंतुक और दर्शकों को
अपने अंदर डुबोए
पत्तल के ऊपर जलते दीए संग
गंगा की यात्रा में समावेश का आह्वान करती है
और,
हर एक के मन में
आस्था के फूल उगाने की कामना में
निरंतर, लगा रहता है हरिद्वार
हाँ, लगा रहता है ।

मूल नेपाली से अनुवाद : अर्जुन निराला