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हवाई जहाज़ / निकोलस गियेन / सुरेश सलिल

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जब यह युग समाप्त हो चुकेगा
और हमारे समस्त मानवकृत अभिलेख
शताब्दियों की ज्वाला में राख हो चुकेंगे,
जब हमारी मौजूदा प्रगति की कुञ्जी खो चुकेगी सदा के लिए
और मानवजाति को अज्ञान की तितिक्षा के साथ
फिर से शुरू करना होगा सब कुछ
प्रकट होंगे तब
हमारी मृत सभ्यता के रूपाकार ।

तब किसी खुदाई में निकले
अथवा किसी पहाड़ की चोटी पर मिले
किसी हवाई जहाज़ के पुराने ज़ंग खाए
भारी-भरकम और अजीब-ओ-ग़रीब ढाँचे को देखकर
क्या कहेंगे, भला, भविष्य के प्रकृति विज्ञानी ?

निश्चय ही वे एक बहुत बड़ा बतंगड़ खड़ा करेंगे
और हवाई जहाज़ को
किसी प्राणिसमूह के नमूनों के बीच दर्ज कर देंगे ।
(1927)

शब्दार्थ