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हसरतों के हंस / नीना कुमार

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वो न हो दोस्त सही, तो चारागर[1] ही सही
दवा-ए-मर्ज़ है उसकी एक नज़र ही सही

वीराँ रहगुज़र पर, हों कोई क्यों मुज़तर[2]
के हमनवा[3] न सही, तो हमसफ़र ही सही

हसरतों के हंसों के नशेमन[4] का शहर है
फलक-ओ-ज़मी न सही, सागर ही सही

यूँ सुकूत[5] से, उन्होंने है कोई बात कही
वो मुक़म्मल हो गई, मुख़्तसर[6] ही सही

अब आबशारों[7] से, अपनी भी आशनाई[8] है
फिर सराबों[9] के मुसाफिर, बेखबर ही सही

वर्क-दर-वर्क[10] बिखरती रही है हस्ती मेरी
के उसे दहर न सही ग़म-ए-दहर[11] ही सही

शब्दार्थ
  1. इलाज करनेवाला
  2. बेचैन
  3. एक जैसी आवाज़
  4. घर
  5. ख़ामोशी
  6. छोटी
  7. झरना
  8. जान पहचान
  9. मृगतृष्णा
  10. पन्ना-पन्ना
  11. दुनिया का ग़म