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हां वही सुख / सांवर दइया

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छिप नहीं सकता वह सुख
तृप्ति बन तिर-तिर
चेहरे पर घिर-घिर
आता हैं फिर-फिर
लुनाई लुटाता
अंगों में आलोक भरता
देह में देवत्व जगाता
 
वही
हां, वही सुख
जो हरा करता ।