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हाथ मिलाने की तहज़ीब / स्वप्निल श्रीवास्तव

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हाथ मिलाने के बाद पता चल जाता है कि
वह दिल से मिलाया जा रहा है या छल
किया जा रहा है ।

जल्दी में मिलाए गए हाथ ठीक से नही मिल पाते
जैसे उन्हें ट्रेन पकड़ने की जल्दी हो
या मारकर भाग जाने की तैयारी हो ।

बाज हाथ ऐसे मुर्दा होते हैं कि उनसे
मिलने पर अफ़सोस होता है,
इससे अच्छा, वे जेब में ही रहते ।

न जाने, कितने हाथ रोज़ मिलते हैं लेकिन
बहुत कम याद रह जाते हैं ।
हाथ मिलाने की तहज़ीब नही रह गई है ।

हाथ मिलाते समय सावधानी से ज़रूर देखें कि
कहीं ख़ँजर तो नही छिपे हुए हैं ।

अब हाथ से हाथ कहाँ मिलते हैं ?
वे तभी मिलते हैं जब दिखाना होता
है हाथ ।

बहुत मासूम होती है यह हाथों की दुनिया ।
वे हमें छूकर हमारा हाल-चाल जान
लेते हैं ।
जैसे ही ये हाथ कन्धे तक पहुँचते हैं
हमें मिलने लगती है राहत ।

ऐसे हाथ कम होते जा रहे हैं ।