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हाफ़िज़ा-ए-ज़िन्दगी है ज़िन्दगी से पेशतर / रवि सिन्हा

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हाफ़िज़ा-ए-ज़िन्दगी[1] है ज़िन्दगी से पेशतर[2] 
आज हो आये उधर से बिन गए उनके शहर
 
गो लड़कपन था मगर उसमें भी कोई बात थी  
गुज़र लेते हैं उधर से अब भी मौक़े देखकर

उम्र की चोटी फ़तह की इस तरह रफ़्तार से 
अह्ले-ग़ाफ़िल चढ़ गए बाहोश उतरे तेज़तर

कौन पढ़ता है यहाँ पर वक़्त का जुग़राफ़िया 
बज़्म कश्ती में जवाँ दरिया की रौ से बेख़बर

आलमे-मौजूद[3] है या आलमे-मौहूम[4] है    
एक बातिल[5] सामने तो वाक़िए[6] सौ बेअसर

दौड़ता रह तेज़ अपनी जगह पर टिकना है तो 
यूँ तिलिस्मी है मगर तिश्ना-ए-ख़ूँ[7] है ये दहर[8]
  
आग उगले है तो उसको ग़र्क़ कर देने की सोच 
शाम तक हो जायगा वो नातवाँ[9] ओ बेशरर[10]

है रवाँ तारीख़ ये इमरोज़[11] बे-फ़र्दा[12] नहीं 
लाज़िमी है मोड़ सद सदियों चलेगा ये सफ़र 

क्या कहे कोई सभी पर गुफ़्त-ए-ग़ालिब[13] का रंग 
अदब होता है उसी जादू से मिसरे खेंचकर

शब्दार्थ
  1. ज़िन्दगी की स्मरण-शक्ति (life’s capacity to remember)
  2. पहले (before)
  3. वास्तविक दुनिया (real world)
  4. काल्पनिक दुनिया (imaginary world)
  5. झूठ (lie, untruth)
  6. घटनाएँ (incidents)
  7. ख़ून का प्यासा (bloodthirsty)
  8. युग, समय (era, time)
  9. कमज़ोर (weak)
  10. बिना चिनगारी के (without spark)
  11. आज का दिन (today)
  12. जिसका कल न हो (without a tomorrow)
  13. ग़ालिब की अभिव्यक्ति (Ghalib’s sayings)