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हाम थारी शरण मै, आगे आज महाराणी / ललित कुमार

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हाम थारी शरण मै, आगे आज महाराणी,
इब दुःख-दर्दा की, या पड़गी बात बताणी || टेक ||

उस दुर्योधन कर्ण-शकुनी नै, करली मनचाही,
रच्या जुए का खेल, चौपड़ दरबारा मै बिछायी,
बिकवाकै राज तमाम, फेर दा पै द्रोपद लायी,
ना था धर्मपुत्र नै ध्यान, सिर चढ़री थी करड़ाई,
इन्द्रप्रस्थ का छुट्या, न्यूं पड़गी विपता ठाणी,

मै दासी द्रोपदी की, रह्या करूं थी पास मै,
घर-कुणबे की ढाल रह्वा थे, ना फर्क दासी-दास मै,
विनती सुणके राणी मेरी, करू हाथ जोड़ अर्दास मै,
आठो पहर काम करूं ना, या शर्त बताद्यु ख़ास मै,
दश दशाओं का भार शीश पै, न्यू पड़री ठोकर खाणी,

पहली शर्त मेरी राणी, ना बाहर एकली जाउंगी,
शर्त दूसरी सुणले राणी, ना झूठा भोजन खाऊँगी,
तीसरी शर्त मै तेरे पति की, ना सेज बिछाऊन्गी,
चार घडी की करूँ चाकरी, ना पाछै हाथ लगाऊन्गी,
तेरै धोरै बण दासी रह्ल्यु, मेरी पड़ैन्गी शर्त पुगाणी ||

चार-पांच दिन होए तड़फती नै, मैं हाण्डू निरणाबासी,
भीड़ पड़ी मै तेरी शरण लेई, मनै ला लियो थाम दासी,
दादा गुरु श्री चन्द्रनाथ, इब दे कांट गले फांसी,
गुरु जगदीश पुकार सुंणो, मेरी होज्या दूर उदासी,
ललित कुमार तै मिलण की खातिर, मै आगी गाम बुवाणी ||