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हिमाला / इक़बाल

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ऐ हिमाला[1] ऐ फ़सीले किश्वरे-हिन्दोस्ताँ[2]
चूमता है तेरी पेशानी[3] को झुककर आसमाँ

तुझमें कुछ पैदा नहीं देरीना-रोज़ी[4] के निशाँ
तू जवाँ है गर्दिशे-शामो-सहर के दरमियाँ[5]

एक जल्वा था कलीमे-तूरे-सीना के लिए
तू तजल्ली [6] है सरापा[7] चश्मे-बीना [8] के लिए

इम्तिहाने-दीदा-ए-ज़ाहिर[9] में कोहिस्ताँ है तू
पासबाँ[10] अपना है तू दीवारे-हिन्दोस्ताँ है तू

मतला-ए-अव्वल फ़लक़ जिसको हो, वो दीवाँ[11] है तू
सू-ए-ख़िलवतगाहे-दिल [12] दामनकशे-इंसाँ है तू

बर्फ़ ने बाँधी है दस्तारे-फ़ज़ीलत[13] तेरे सर
ख़न्दाज़न[14] है जो कुलाहे-मेहरे-आलम ताब पर

तेरी उम्रे-रफ़्ता[15] की इक आन है अहदे-कुहन[16]
वादियों में हैं तेरी काली घटाएँ खेमाज़न

चोटियाँ तेरी सुरैया[17] से हैं सरगर्मे-सुख़न[18]
तू ज़मीं पर और पहना-ए-फ़लक़ तेरा वतन

चश्म-ए-दामन तेरा आईना-ए-सैयाल[19] है
दामने मौजे-हवा जिसके लिए रूमाल है

अब्र[20] के हाथों में रहवारे -हवा के वास्ते
ताज़ियाना[21] दे दिया बर्क़े-सरे-कुहसार[22] ने

ऐ हिमाला! कोई बाज़ी-गाह[23] है जिसके लिए
दस्ते-क़ुदरत[24] ने ने बनाया है अनासिर[25] के लिए

हाय क्या फ़र्ते-तरब में झूमता जाता है अब्र
फ़ीले-बेज़ंजीर[26] की सूरत उड़ा जाता है दिल

जुंबिशे-मौजे-नसीमे-सुबह[27] गहवारा[28] बनी
झूमती है नश्शा-ए-हस्ती[29] में हर गुल की कली

यों ज़बाने-बर्ग से गोया है उसकी ख़ामुशी
दस्ते-गुलचीं[30] की झटक मैंने नहीं देखी कभी

कह रही है मेरी ख़ामोशी यह अफ़साना मिरा
कुंजे-ख़िलवत, ख़ाना-ए-क़ुदरत [31]है काशना[32] मिरा

आती है नदी फ़रोज़े-कोह[33] से गाती हुई
कौसरो-तस्नीम[34] की मौजों को शर्माती हुई

आईना-सा शाहिदे-क़ुदरत[35] को दिखलाती हुई
संगे-रह से गाह[36] बचती, गाह टकराती हुई

छेड़ती जा इस इराक़े-दिलनशीं के राज़ को
ऐ मुसाफ़िर! दिल समझता है तेरी आवाज़ को

लैली-ए-शब खोलती है आ के जब ज़ुल्फ़े -रसा[37]
दामने-दिल खींचती है आबशारों[38] की सदा

वो ख़मोशी शाम की जिस पर तकल्लुम हो फ़िदा
वो दरख़्तों पर पर तफ़क्कुर का समाँ छाया हुआ

काँपता फिरता है क्या रंगे-शफ़क़[39] कोहसार[40] पर
ख़ुशनुमा लगता है ये ग़ाज़ा तेरे रुख़सार[41] पर

ऐ हिमाला ! दास्ताँ उस वक़्त की कोई सुना
मस्कने-आबा-ए-इन्साँ जब बना दामन तिरा

कुछ बता उस सीधी -सादी ज़िन्दगी का माजरा
दाग़ जिसपर ग़ाज़ा-ए-रंगे-तक़ल्लुफ़[42] का न था

हाँ दिखा दे ऐ! तसव्वुर[43] फिर वो सुबहो-शाम तू
दौड़ पीछे की तरफ़ ऐ गर्दिशे-अयाम[44] तू

शब्दार्थ
  1. हिमालय पर्वत
  2. भारत की चार दीवारी
  3. माथा
  4. पुराने काम-धन्धे
  5. सुबह शाम के चक्कर के बीच
  6. रोशनी
  7. सिर से पैरों तक
  8. देखने वाली आँख
  9. प्रत्यक्ष रूप में परीक्षा रूपी पहाड़
  10. रक्षक
  11. ऐसा दीवान(काव्य-संकलन) जिसका पहला शे’र क्षितिज है
  12. दिल जैसी एकान्त जगह की तरफ़
  13. लज्जा की पगड़ी
  14. हँसने वाले
  15. बीती हुई आयु
  16. प्राचीनकाल
  17. छह नक्षत्र
  18. वार्तालप करने को सुख़न
  19. बारीक दर्पण
  20. बादल
  21. कोड़े मारने का दण्ड
  22. पहाड़ों पर चमकने वाली बिजली
  23. खेल का मैदान
  24. प्रकृति के हाथ
  25. चार तत्वों
  26. स्वतंत्र गज
  27. सुबह की हवा का झोंका
  28. हिंडोला
  29. अस्तित्व के नशे में
  30. माली के हाथों
  31. प्रकृति का निवास
  32. मकान
  33. पर्वत की ऊँचाई
  34. स्वर्ग की पवित्र नहर
  35. प्रकृति रूपी गवाह
  36. कभी
  37. सम्पूर्ण केश-राशि
  38. झरनों
  39. सुबह-शाम के समय आसमान की लालिमा
  40. पहाड़
  41. गालों
  42. औपचारिकता की लाली
  43. कल्पना
  44. काल-चक्र