भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

हे भले आदमियो ! / गोरख पाण्डेय

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


डबाडबा गई है तारों-भरी

शरद से पहले की यह

अँधेरी नम

रात ।

उतर रही है नींद

सपनों के पंख फैलाए

छोटे-मोटे ह्ज़ार दुखों से

जर्जर पंख फैलाए

उतर रही है नींद

हत्यारों के भी सिरहाने ।

हे भले आदमियो !

कब जागोगे

और हथियारों को

बेमतलब बना दोगे ?

हे भले आदमियो !

सपने भी सुखी और

आज़ाद होना चाहते हैं ।


(रचनाकाल : 1980)