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हे मेरी तुम !. / केदारनाथ अग्रवाल

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हे मेरी तुम !

जब आषाढ़ी बादल आएँ

आसमान में और हवा में

हाथी धायें

ऊँचे-ऊँचे सूँड़ उठाएँ

और झमाझम पानी बरसे

तब तुम उस नव बरसे जल में,

अपने तन पर लाल लपेटे,

अपनी छत पर ख़ूब नहाना

और बाद में

उन्हें आँख के

खिले कमल के फूल चढ़ाना !

यह स्वभाव है सुधी जनों का

और घनों का,

वह प्रसन्न होते हैं

रमणी के अर्पण से !