भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

है जो त्रिगुणातीत, नित्य, अज / हनुमानप्रसाद पोद्दार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

(राग खमाज-ताल कहरवा)
है जो त्रिगुणातीत, नित्य, अज, अव्यय, नाम-रूप गति हीन।
 हिममें नीर-सदृश जो व्यापक सबमें, सबसे परे, अलीन॥
 अद्वय कारण, अद्वय, जिसमें है सबका अत्यन्ताभाव।
 शुद्ध बोधघन, सत्य स्वस्थ, सनातन, रहित भावमय भाव॥
 रवि-शशि-‌अनल प्रकाशित होते जिसका तेज-‌अंश पाकर।
 व्योम, वायु, रस भूमि, अग्रिका एकमात्र जो है आकर॥
 अधिष्ठस्नन सब जगका, निज मायामें रचता नाना वेश।
 परद्रष्टस्न, अनुमन्ता, जो भर्ता, भोक्त, ईश्वर, परमेश॥
 सुधा-सने सौन्दर्य-राशिका है जो अति अनुपम सागर।
 त्रिभुवनकी सब रूपछटा है जिसकी नन्हीं-सी गागर॥
 कर अधीन निज-प्रकृञ्ति, योगमायासे अघटन घटना कर।
 है नित नूतन वेष धारता विश्वविमोहन बाजीगर॥
 सबका जो सर्वस्व, आत्मवित, भक्तका जो जीवन-धन।
 जिसके परमानन्द रूपसे नित्यानन्दित हैं निज-जन॥
 प्राणाधिक आराध्यदेव जो, नित नव-नव आनँद-निर्झर।
 भक्तञ्वश्य साकार, सगुण, जन-मन-पंकजका जो दिनकर॥
 जीवन-मन-तन-सुधि-हर होती जिसकी मधुर मन्द मुसकान।
 जिसकी सुन्दर छटा निरखकर छुटती लोक-वेद-कुञ्ल-कान॥
 देव, दनुज, मुनि, ऋञ्षि जिसके दर्शनको संतत ललचाते।
 विविध भाँति तप-साधन करते, नहीं सहजमें हैं पाते॥
 जन्म जन्मसे लगी हु‌ई थी जिनके दर्शनकी आशा।
 रूप-सुधा वारिधि-‌अवगाहनकी जिसके थी अभिलाषा॥
 जिसने अपने मिलनेकी व्याकुञ्लता भर दी थी मनमें।
 विरहानल था धधक उठा जिससे उसके सारे तनमें॥
 वही ब्रह्मा साकार प्रकट हो, अद्भुत दर्शन है देता॥
 सत्वर अगणित जन्मोंकी अघराशि पूर्ण है हर लेता॥
 यह साधन-विहीन था, कारण किंञ्तु एक बलवान अपार ।
 निश्चित ब्रह्मारूप गुरुवरकी थी अनुकपा-पारावार॥
 उनकी प्रेम-रज्जुसे हरिको बँधना पड़ा स्वयं तत्काल।
 रखनी पड़ी अभय करनेको नत मस्तकपर भुजा विशाल॥
 कोमल कर-स्पर्शसे जनको निर्भय नित्य पड़ा करना।
 चरण-स्पर्श अभयवाणी, मधुर प्रसादसे दुख हरना॥
 उस छवि-राशि अमितका वर्णन करनेमें वाणी लाचार।
 मापा कभी न जा सकता है हाथोंसे आकाश अपार॥
 भाग्यवती जिन आँखोंने वह देखी रूप-छटा अनुपम।
 तृप्त हो गयीं, नहीं बता सकती हैं, वर्णनमें अक्षम॥
 वाणी कुञ्छ प्रयास करती है, नेत्रोंका सहाय लेकर।
 मनमोहनके अतल रूपकी मधुर स्मृतिमें मन देकर॥
 उस स्मृतिमें जाते ही तत्क्षण रूपमग्र मन हो जाता।
 मनके रुकते ही वाणीका काम नहीं कुञ्छ हो पाता॥
 रुकी लेखनी बंद हो गयी, चलता नहीं हाथ आगे।
 क्षमा कीजिये प्रेमी पाठक, सरल पाठिका सद्भागे॥
 पूर्ण प्रेमसे मिल करके सब, करिये उनका प्रेमाह्वान।
 जिससे सत्वर पुनः प्रकट हों सबके समुख श्रीभगवान्‌॥