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होया मुश्किल जीना, ना अन्न-जल कीना / दयाचंद मायना

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होया मुश्किल जीना, ना अन्न-जल कीना, ना पानी पीना
बोस चल दीना, छूटे पसीना, जेठ का महीना, गर्मी लागै घाम पड़ै...टेक

जगत मैं दुःख पाकै सुख मिलै, बोस पैदल दिन-रात चलै
जणुं चलै बछेरा, शेर सा चेहरा, मर्द भतेरा, कै लाग्या बेरा
देके घेरा, बोस का डेरा, बर्मा और आसाम पड़ै...

छोड़ गए बाजै हुक, देख लो आजादी के सुख
दुःख ध्याड़ां मैं, फिरूं ताड्यां मैं, दिन माड्यां मैं, गीतवाड़ां मैं
कदे पहाड़ां मैं, कदे झाड़ां मैं, पाह पाट-पाट लहू चाम पड़ै...

कौम एशिया की सारी जुड़े, शेर की ना नाड़ मुड़ै
उड़ै हम चालै, ना कम चालै, थम-थम चालै, हरदम चाले
बिड़गम चालै, और बम चालै, जब रणभूमि म्हं काम पड़ै...

बैठलो ब्राह्मण, हरिजन जाट, रेल सै या बिना डरेवर गाट,
दे काट फंद, गोपाल नंद, ना रहे बंद, आजाद हिन्द
कथ नए छंद, भाई दयाचन्द, तेरा जब कवियों मै नाम पड़ै...